मंगलवार, 21 अगस्त 2012

नई कविता की प्रवृत्तियां

प्रयोगवाद और नई कविता की प्रवृत्तियों में कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई देता। नई कविता प्रयोगवाद की नींव पर ही खड़ी है। फिर भी कथ्य की व्यापकता और दृष्टि की उन्मुक्तता,ईमानदार अनुभूति का आग्रह,सामाजिक एवं व्यक्ति पक्ष का संश्लेष,रोमांटिक भावबोध से हटकर नवीन आधुनिकता से संपन्न भाव-बोध एक नए शिल्प को गढ़ता है। वादमुक्त काव्य,स्वाधीन चिंतन की व्यापक स्तर पर प्रतिष्ठा,क्षण की अनुभूतियों का चित्रण,काव्य मुक्ति, गद्य का काव्यात्मक उपयोग,नए सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति,अनुभूतियों में घनत्व और तीव्रता,राजनीतिक स्थितियों पर व्यंग्य,नए प्रतीकों-बिम्बों-मिथकों के माध्यम से तथा आदर्शवाद से हटकर नए मनुष्य की नई मानववादी वैचारिक भूमि की प्रतिष्ठा नई कविता की विशेषताएं रहीं हैं। अब इन विशेषताओं पर एक चर्चा-

1.अनुभूति की सच्चाई तथा यथार्थ बोध:-अनुभूति क्षण की हो या समूचे काल की,किसी सामान्य व्यक्ति (लघुमानव)की हो या विशिष्ट पुरुष की,आशा की हो या निराशा की वह सब कविता का कथ्य है। समाज की अनुभूति कवि की अनुभूति बन कर ही कविता में व्यक्त हो सकती है। नई कविता इस वास्तविकता को स्वीकार करती है और ईमानदारी से उसकी अभिव्यक्ति करती है। इसमें मानव को उसके समस्त सुख-दुखों,विसंगतियों और विडंबनाओं को उसके परिवेश सहित स्वीकार किया गया है। इसमें न तो छायावाद की तरह समाज से पलायन है और न ही प्रयोगवाद की तरह मनोग्रंथियों का नग्न वैयक्तिक चित्रण या घोर व्यक्तिनिष्ठ अहंभावना। यह कविता ईमानदारी के साथ व्यक्ति की क्षणिक अनुभूतियों को,उसके दर्द को संवेदनापूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करती है:-

आज फिर शुरु हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी सी सरस सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा
जी भर कर शीतल जल से स्नान किया
आज एक छोटी सी बच्ची आयी
किलक मेरे कंधे पर चढ़ी
आज आदि से अंत तक एक पूरा गान किया
आज जीवन फिर शुरु हुआ
                                                                       --रघुवीर सहाय

चेहरे थे असंख्य
आंखें थीं
दर्द सभी में था
जीवन का दंश सभी ने जाना था
पर दो
केवल दो
मेरे मन में कौंध गयीं
मैं नहीं जानता किसकी वे आंखे थी
नहीं समझता फिर उनको देखूंगा
परिचय मन ही मन चाहा तो उद्यम कोई नहीं किया
किंतु उसी की कौंध
मुझे फिर फिर दिखलाती है
.
.
वही परिचित दो आंखें ही
चिर माध्यम हैं
सब आंखों से सब दर्दों से
मेरे चिर परिचय का
                                                                                 --अज्ञेय
2.कथ्य की व्यापकता और दृष्टि की उन्मुक्तता: नई कविता में जीवन के प्रति आस्था है। जीवन को इसके पूर्ण रूप में स्वीकार करके उसे भोगने की लालसा है। नई कविता ने जीवन को जीवन के रूप में देखा,इसमें कोई सीमा रेखा निर्धारित नहीं की। नई कविता किसी वाद में बंध कर नहीं चलती। इसलिए अपने कथ्य और दृष्टि में विस्तार पाती है।नई कविता का धरातल पूर्ववर्ती काव्य-धाराओं से व्यापक है,इसलिए उसमें विषयों की विविधता है। एक अर्थ में वह पुराने मूल्यों और प्रतिमानों के प्रति विद्रोही प्रतीत होती है और इनसे बाहर निकलने के लिए व्याकुल रहती है। नई कविता ने धर्म,दर्शन,नीति,आचार सभी प्रकार के मूल्यों को चुनौती दी है,यदि ये मात्र फारमुलें हैं,मात्र ओढ़े हुए हैं और जीवन की नवीन अनुभूति,नवीन चिंतन,नवीन गति के मार्ग में आते हैं। इन मान्य फारमूलों को,मूल्यों की विघातक असंगतियों को अनावृत करना सर्जनात्मकता से असंबद्ध नहीं है,वरन् सर्जन की आकुलता ही है। नई कविता के कवियों में से अधिकांश प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के खेमों में रह चुके थे। प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की अपेक्षा अधिक व्यापक मानवीय संदर्भ,उसकी समस्याएं और विज्ञान के नए आयाम से जुड़ कर नई कविता ने अपना विषय विस्तार किया। आम आदमी जिस पीड़ा को झेलता है,औसत आदमी(मध्य-वर्गीय) जिस जीवन को जीता है,वही लघु मानव इस कविता का नायक बनता है। उसे इतिहास ने अब तक अपने से अलग ही रखा है। इसलिए नई कविता उसकी पीड़ा,अभाव और तनाव झेलती है:

तुम हमारा जिक्र इतिहासों में नहीं पाओगे
और न उस कराह का
जो तुम ने उस रात सुनी
क्योंकि हमने अपने को इतिहास के विरुद्ध दे दिया है

मनुष्य के भीतर मानवता का अंश शहर-दंश से कैसे नष्ट हो जाता है और वह स्वार्थ के संकीर्ण संसार में जीवित रहने के लिए कैसे विवश कर दिया जाता है; अज्ञेय ने इसी पीड़ा को कविता में यूं ब्यां किया है-

बड़े शहर के ढंग और हैं,हम गोटें हैं यहां
दाँव गहरे हैं उस चोपड़ के

श्रीकांत वर्मा के शब्दों में शहरी जिंदगी का सच -

चिमनियों की गंध में डूबा शहर
शाम थककर आ रही है कारखानों में

3. मानवतावाद की नई परिभाषा: नई कविता मानवतावादी है,पर इसका मानवतावाद मिथ्या आदर्श की परिकल्पनाओं पर आधारित नहीं है। उसकी यथार्थ दृष्टि मनुष्य को उसके पूरे परिवेश में समझने का बौद्धिक प्रयास करती है। उसकी उलझी हुई संवेदना चेतना के विभिन्न स्तरों तक अनुभूत परिवेश की व्याख्या करने की कोशिश करती है। नई कविता मनुष्य को किसी कल्पित सुंदरता और मूल्यों के आधार पर नहीं,बल्कि उसके तड़पते दर्दों और संवेदनाओं के आधार पर बड़ा सिद्ध करती है। यही उसकी लोक संपृक्ति है। अज्ञेय की एक कविता-

अच्छा
खंडित सत्य
सुघर नीरन्ध्र मृषा से
अच्छा
पीड़ित प्यार
अकंपित निर्ममता से
अच्छी कुंठा रहित इकाई
सांचे ढले समाज से
अच्छा
अपना ठाठ फकीरी
मंगनी के सुख साज से
अच्छा सार्थक मौन
व्यर्थ के श्रवण मधुर छंद से
अच्छा
निर्धन दानी का उघड़ा उर्वर दु:ख
धनी सूम के बंजर धुआं घुटे आनंद से
अच्छे
अनुभव की भट्ठी में तपे हुए कण, दो कण
अंतर्दृष्टि के
झूठे नुस्खे रूढ़ि उपलब्धि परायी के प्रकाश से
रूप शिव रूप सत्य सृष्टि के
                                                                (अरी ओ करुणा प्रभामय)
4. कुंठाओं और वर्जनाओं से मुक्ति का संदेश: नई कविता स्वयं को किसी विषय से अछूता नहीं समझती। नई कविता समाज की वर्जनाओं और व्यक्ति की कुंठाओं से निकल कर स्पष्ट और कोमल अनुभूतियों को यथार्थ की कसौटी पर कस कर अभिव्यक्ति देती है। उसमें यदि आदर्श के प्रति लगाव नहीं है तो अनुभूति के प्रति ईमानदारी में भी कोई कपट नहीं है। नए कवियों ने आवाज उठाई कि हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन।कम से कम वाली बात हम से न कहिए। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास में एक मार्के की बात कही कि नई कविता इस सारे के सारे जीवन और गरबीली गरीबी का काव्य है। जिसमें व्यक्ति की चेतना जीवन के सारे व्यापारों में,खेत-खलिहान में,नगर-गांव में व्यापक धरातल पर व्यक्ति की अनुभूतियों को स्वर देती है। मर्यादा और आस्था इस साधारण व्यक्ति के लिए कोई मायने नहीं रखते-

ज्ञान और मर्यादा
उसका क्या करें हम
उनको क्या पीसेंगे?
या उनको खाएंगे?
या उनको ओढ़ेगे?
या उनको बिछाएंगे?

5.विवेक और विचार की कविता: नई कविता में केवल भाव-बोध की अंधी श्रद्धा नहीं है बल्कि उसमें तर्क बुद्धि,विवेक और विचार है। डॉ.लक्ष्मीकांत वर्मा के शब्दों में -उसकी प्रकृति है प्रत्येक सत्य को विवेक से देखना,उसके परिप्रेक्ष्य में प्रयोग के माध्यम से निष्कर्ष तक पहुंचना। बाह्य स्थितियों के प्रति सतर्क और सचेत होकर कवि मानसिक विश्लेषण की ओर बढ़ता है--

मैं खुद को कुरेद रहा था
अपने बहाने उन तमाम लोगों की असफलताओं को
सोच रहा था जो मेरे नजदीक थे
इस तरह साबुत और सीधे विचारों पर
जमी हुई काई और उगी हुई घास को
खरोंच रहा था,नोच रहा था

6. विसंगतियों का बोध : नई कविता मानव-नियति को लेकर उसकी विसंगतियों के प्रति जागरुक रहती है। भारतीय राजनीति में निरंतर जो विसंगतियां उभरी हैं,सामाजिक और आर्थिक धरातल पर जो विरोधाभास आया है,उसे यह कविता मोह भंग की स्थिति में उजागर करती है। यही कारण है इसमें आक्रोश,नाराजगी,घृणा
और विद्रोह उभर आता है। आक्रोश के साथ निषेध के तेवर भी इसमें देखे गए हैं:-

आदमी को तोड़ती नहीं हैं
लोकतांत्रिक पद्धतियां
केवल पेट के बल
उसे झुका देती हैं धीरे-धीरे अपाहिज
धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए
उसे शिष्ट राजभक्त देश-प्रेमी नागरिक
बना लेती हैं

7.द्वंद्व और संघर्ष : नई कविता का आत्मसंघर्ष काव्यात्मक बनावट में सामाजिक बुनियादी मुद्दों को उठाता है। आज की व्यवस्था में और उस व्यवस्था से जुड़े हुए प्रश्नों में कविता संघर्ष का मार्ग ढूंढ़ती है। उसका धरातल भी व्यापक है। यह संघर्ष आत्मीय प्रसंगों में भी उभरता है। उसमें सामाजिक और मानवीय व्यापार,संदर्भ उभरते हैं। ये कविताएं विषमता से जूझती हैं और नया रास्ता सुझाने का प्रयास करती हैं। परिस्थितियों को बदलने और उनसे बाहर निकलने की छटपटाहट इनमें देखी जाती है। वह समस्याओं को पहचानती है--

जब भी मैंने उनसे कहा है कि देश शासन और
राशन....उन्होंने मुझे रोक दिया है
वे मुझे अपराध के असली मुकाम पर
उंगली रखने से मना करते हैं

8.परिवेश संबंधी सत्यों का प्रकटन:नई कविता ने समग्र जीवन की प्रामाणिक अनुभूतियों को उनके जीवंत परिवेश में व्यक्त किया,विषय या अनुभूति के आभिजात्य और भिन्न-भिन्न दृष्टियों या वादों से बने हुए उनके घेरों को तोड़कर व्यक्ति द्वारा भोगे हुए जीवन के हर छोटे-बड़े सत्य को प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से उभारने में ही कविता की सार्थकता समझी। बदलते हुए संदर्भों में परिवेशगत परिवर्तन केवल नगर के जीवन में ही नहीं आए,बल्कि इस नगरीय यांत्रिकता का दबाव गांव के जीवन पर भी पड़ा। उस ओर भी मूल्यों का विखंडन हुआ और जिंदगी में तनाव बढ़ा। परिवेश के परायेपन से उपजी पीड़ा नास्टेलजिया के रूप में प्रकट हुई। नई सभ्यता ने केवल शहर के आदमी को ही नहीं तोड़ा,बल्कि गांव के आदमी को भी गांव से बेगाना कर दिया--

याद आते घर
गली चौपाल,कुत्ते,मेमने,मुर्गे,कबूतर
नीम तरु पर
सूख कर लटकी हुई कड़वी तुरई की बेल
टूटा चौंतरा
उखड़े ईंट पत्थर
बेधुली पोशाक पहने गांव के भगवान मंदिर
........

आज की शहरी रोजमर्रा जिंदगी की अनुभूतियों को बड़ी सहजता से अभिव्यक्ति नई कविता में मिली है। उन अभिव्यक्तियों को जो पल-पल के अंतर्विरोधों की उपज हैं। ऊपर से रंगीन दिखाई देने वाली शहरी जिंदगी व्यक्ति को कितना विदेह कर देती है और विदेह होकर भी आज का आदमी दर्द से छुटकारा नहीं पाता और वह केवल दर्द बनकर रह जता है,भारत भूषण अग्रवाल की एक कविता देखिए- -

और तब धीरे-धीरे ज्ञान हुआ
भूल से मैं सिर छोड़ आया हूं दफ्तर में
हाथ बस में ही टँगे रह गए
आँखें जरूर फाइलों में ही समा गई
मुँह टेलिफोन से ही चिपटा-सटा होगा
और पैर,हो-न-हो
क्यू में रह गए हैं
तभी तो मैं आज
घर आया हूं विदेह ही
देह हीन जीवन की कल्पना तो
भारतीय परंपरा का सार है
पर उसमें क्या यह थकान भी शामिल है
जो मुझ अंगहीन को दबोचे ही जाती है

9.यथार्थ की पीड़ा का चित्रण : नई कविता वास्तव में व्यक्ति की पीड़ा की कविता है। प्रयोगवादी कविता में जहां व्यक्ति के आंतरिक तनाव और द्वंद्वों को उकेरा गया है वहीं नई कविता में वह व्यापक सामाजिक यथार्थ से जुड़ता है। जिंदगी की मारक स्थितियों को,उसकी ठोस सच्चाइयों को और राजनीतिक सरोकारों को यह कविता भुलाती नहीं है;पर यह न तो उत्तेजना बढ़ाती है और न ही कवि भावुकता का शिकार होता है। अपने अनुभव के सत्य को कवि बाहर के संसार के सत्य से भी जोड़ता है। इससे नई कविता का काव्यानुभव पुरानी कविता के काव्यानुभव से अलग तरह का हो जाता है--

एकाएक मुझे भान होता है जग का
अखबारी दुनिया का फैलाव
फंसाव,घिराव,तनाव है सब ओर
पत्ते न खड़के
सेना ने घेर ली हैं सड़कें

10. व्यंग्य के तेवर : नई कविता ने व्यंग्य के तेवर को अधिक पैना और धारदार बनाया। समस्याओं को समझकर उसने उस पर व्याख्यान करने की अपेक्षा उसे कसे हुए सीधे शब्दों में प्रकट किया। यह व्यंग्य भी विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति पाता है और इसका क्षेत्र भी व्यापक हो जाता है। किसी भी क्षेत्र में हो रहे शोषण फिर चाहे वह राजनीतिक हो या धार्मिक व्यक्ति, अथवा समाज,आदर्श हो या यथार्थ सब पर व्यंग्य की पैनी धार चली है...

बड़े-बड़े आदर्श वाक्यों को
स्वर्णाक्षरों में लिखवाकर
अपने ड्राइंगरूम में सजा दो
उन्हें अपनी
आस्था,श्रद्धा एवं निष्ठा का
अर्घ्य दो

11. नई कविता वादमुक्त कविता : नई कविता किसी वाद से बंधी नहीं है। यह इस कविता की बहुत बड़ी विशेषता है। शायद यही कारण है कि प्रगतिवादियों ने भी नई कविता की धुन में कविता लिखनी शुरु कर दी। रांगेय राघव जैसा प्रगतिशील कवि नई कविता के युग में अपनी काव्य धारा को अक्षुण्ण रखते हुए नई कविता की शब्द योजना में कविता लिखता है...

ठहर जा जालिम महाजन
तनिक तो तू खोल वह मदिरा विघूर्णित आँख अपनी
देख,कहाँ सौ लाया बता सम्पत्ति
कहां से लाया बता साम्राज्य।

12. नारी के प्रति दृष्टिकोण: नारी के प्रति छायावादी कवियों की दृष्टि सम्मानपूर्ण,स्नेह-वात्सल्यपूर्ण एवं श्रद्धापूर्ण थी। प्रसाद,निराला और पंत ने नारी को अत्यधिक आदर और गौरव के साथ स्मरण किया है--नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत पग नख तल में ...आदि पंक्तियों में प्रसाद ने नारी को जो उच्च स्थान दिया,वह इस युग के कवियों ने नहीं दिया। नर नारी के बीच सृष्टि के आरम्भ से चले आ रहे संबंधों पर रघुवीर सहाय की टिप्पणी--

नारी बिचारी है,पुरुष की मारी है
तन से क्षुधित है,मन से मुदित है
लपक झपककर अंत में चित्त है

13. सौंदर्यबोध : नई कविता का सौंदर्य-शास्त्र और उसका सौंदर्य-बोध निश्चय ही अनेक संदर्भों में व्यापक हुआ है। उसमें सच्चाई,टकराव और मोहभंग की स्थिति नई चेतना के रूप में आई है। यह कविता आध्यात्मिक और दार्शनिक विषयों से भी अब परहेज नहीं करती। इसमें फिर से पेड़,पौधे,पक्षी,बच्चे,मां,गांव,शहर,वतन,रोमांस,प्रेम,प्रकृति-चित्रण आदि का समावेश हुआ। इससे अनुभूति को नए पंख लगे और उसने काव्य में नए रूप धरे।

14.भाषा :नई कविता भाषा के क्षेत्र में भी आधुनिक-बोध के साथ बढ़ती है और नई होती है।नया कवि पुरानी भाषा में नई संवेदना को को अभिव्यक्ति के लिए समर्थ नहीं पाता,इसलिए वह भाषा के नए रूप को गढ़ने के लिए तत्पर रहता है:

शब्द अब भी चाहता हूँ
पर वह कि जो जाए वहां जहां होता हुआ
तुम तक पहुंचे
चीज़ों के आर-पार दो अर्थ मिलाकर सिर्फ एक
स्वच्छंद अर्थ दे

नई कविता की इस नई भाषा में गद्यात्मकता के प्रति विशेष लगाव बन गया है। कहीं-कहीं तो कविता गद्य का प्रतिरूप लगती है। अलंकृत भाषा को नई कविता में बहिष्कृत किया गया है। सपाट शब्दों में अभिव्यक्ति से इसमें सपाटबयानी आ गई है तो कहीं खुरदरी हो गई है। कहीं-कहीं तो कविता सिर्फ ब्यौरा बन कर रह गई है। नई कविता के कुछ कवियों ने स्वयं को मौलिक और उत्साही साबित करने के लिए स्थापित मूल्यों को भी अस्वीकार करने में अभिधा शैली से अभिव्यक्ति का दंभ भरा है। अशोक वाजपेयी ने ऐसे कवियों की सतही मुद्रा,फिकरेबाजी,चालू मुहावरेदानी और पैगम्बराना अंदाज को समर्थ कविता के लिए घातक बताया है; उन्ही के शब्दों में-- रचनात्मक स्तर पर भाषा के संस्कार के प्रति,उसकी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति,उदासीनता आयी है और पारम्परिक अनुगूंजों और आसंगों से कवियों के अज्ञान और अरुचि के कारण,कट जाने से काव्य भाषा में ज्यादातर युवा कवियों की भाषा में सपाटता,सतहीपन और मानवीय दरिद्रता आयी है। इस संदर्भ में मणि मधुकर की कविता का एक अंश...

श्रद्धा,सम्मान और प्रेरणा जैसे शब्दों को
पान की पीक के साथ थूकता हूं मैं
मंत्रिमंडलों में बलात्कार करनेवाले लोगों पर
मेरे थूक का रंग लाल है,
काश,मेरे खुन का रंग भी लाल होता

यद्यपि नई कविता का शब्द संसार बहुत व्यापक है। इसमें संस्कृत,हिंदी,उर्दू तथा प्रांतीय भाषाओं और बोलियों के साथ-साथ अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग सामान्य हो गया है। कई जगह नए विशेषणों तथा क्रियापदों का निर्माण किया गया है;जैसे- रंगिम,चंदीले,लम्बायित,उकसती,बिलमान,हरयावल आदि। विज्ञान,धर्म,दर्शन,राजनीति,समाजशास्त्र आदि सभी क्षेत्रों से उसने शब्दों का चयन किया है। आम आदमी के स्वर,चिर-परिचित शब्द आज की कविता में देखे जा सकते हैं। जन भाषा में सूक्तियों,लोकोक्तियों और मुहावरों का का प्रयोग कभी व्यंग्य प्रदर्शन के लिए तो कभी  आम आदमी का आक्रोश व्यक्त करने के लिए। लोकगीतों व लोकधुनों के आधार पर भी कविता की रचना की गई। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नई कविता ने भाषा को अपनी सुविधा के अनुरूप तोड़ा-मरोड़ा है,यह भाषा के साथ खिलवाड़ है।

15. प्रतीक : नई कविता ने नवीन और प्राचीन दोनों तरह के प्रतीक चुनें हैं। परम्परागत प्रतीक नए परिवेश में नए अर्थ के साथ प्रयुक्त हुए हैं। नए प्रतीकों में भेड़,भेड़िया,अजगर जैसे शब्दों को जनता,सत्ताधारी वर्ग,व्यवस्था आदि के प्रतीक रूप में प्रयोग किया गया है। पृथ्वी,पहाड़,सूरज,चांद,किरण,सायं,कमल आदि परम्परागत अर्थ से हट कर नए अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं। मुक्तिबोध के प्रतीक वैज्ञानिक जीवन से लेकर आध्यात्मिक क्षेत्र तक फैलें हैं। ओरांग-उटांग तथा ब्रह्मराक्षस जैसे प्रतीक बहुत ही सटीक और समर्थ हैं। पीपल का वृक्ष भी उनका विशेष प्रिय प्रतीक रहा। मौसम शब्द भी प्रतीक बन कर वर्तमान परिवेश को अर्थ देता है--

छिनाल मौसम की मुर्दार गुटरगूं

16.बिंब : नई कविता में बिंब कविता की मूल छवि बन गए हैं, अपनी अंतर्लयता के लिए इसमें बिंबबहुलता हो गई है। कवियों ने इन बिंबों को जीवन के बीच से चुना है।व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों तरह के बिंब इस कविता में हैं। पौराणिक और ऐसतिहासिक बिंब नए अर्थ और संदर्भ में लोक-संपृक्ति के साथ उदित हुए हैं। शहरी कवि के बिंब विशेषतया नागरिक जीवन के और ग्रामीण जीवन के संस्कारों से युक्त कवि के बिंब विशेषतया गांव के होते हैं। जीवन के नए संदर्भों में उभरने वाले वाली अनुभूतियों,सौंदर्य-प्रतीतियों और चिंतन आयामों से संपृक्त बिंब नई कविता ग्रहण करती है...

शाखों पर जमे धूप के फाहे
गिरते पत्तों से पल ऊब गये
हकाँ दी खुलेपन ने फिर मुझको
लहरों के डाक कहीं डूब गये
                                                                   ---केदारनाथ सिंह

बँधी लीक पर रेलें लादे माल
चिहुँकती और रंभाती अफराये
                                डागर सी
                                                                 ---अज्ञेय

ठिलती-चलती जाती हैं
नदिया में बाढ़ आयी
ढूह सब ढह गये
हरियाये किनारे,सूखे पत्ते सब बह गये
रस में ये डूबे पल
कानों में कह गये
तपने से डरते थे
इसलिए देखो
तुम आज सूखे रह गये
                                                            ---भारत भूषण अग्रवाल
17. उपमान : नई कविता में जहां अलंकारों का बहिष्कार हुआ,वहीं नए उपमान के प्रयोग से उसका शिल्प नव्य चेतना को यथार्थ अभिव्यक्ति देने में समर्थ हो गया है। लुकमान अली और मोचीराम जैसी लंबी कविताओं के शीर्षक ही उपमान बनकर आते हैं और आदमी की व्यथा का इतिहास प्रकट करते हैं। नई कविता में आटे की खाली कनस्तर जैसी चीजें भी उपमान बनती हैं:

प्यार,इश्क खाते हैं ठोकर
आटे के खाली कनस्तर से

अपने आस-पास फैले हुए वातावरण और वस्तुओं को कवि उपमान बनाकर प्रस्तुत करता है:-

उंगलियों में अहसास दबा है
सिगरेट की तरह
तथा सन्नाटा
लटकी हुई कमरे की कमीज और हैंगर सा
झूल रहा था

18. रस :नई कविता में रस का मूल बिम्बविधान है। नई कविता के सृजेता कवि बिंब विधान में निश्चय ही समर्थ माने जा सकते हैं और उनका यह सामर्थ्य आज बुद्धि समन्वित होकर परम्परा से कटे हुए रस भावों से संयत होकर विशिष्ट एवं यथेष्ट रसों की सृष्टि कर रहा है। कुछ आलोचकों ने इसे बुद्धि रस की सज्ञा प्रदान की है:

पहले लोग सठिया जाते थे
अब कुर्सिया जाते हैं
दोस्त मेरे!
भारत एक कृषि प्रधान नहीं
कुर्सी प्रधान देश है                              --डॉ. मदनलाल डागा 

19. छंद :छंदों के प्रति विद्रोह प्रयोगवाद से ही आरंभ हो गया था और नई कविता ने विद्रोह की इस आग को ठंडा नहीं होने दिया। हिंदी कविता आज मुक्तक छंद को ही अपनाती है। लेकिन इसमें तुकांत के प्रति युवा कवियों में आकर्षण बढ़ा है। छंद के प्रति आग्रह न होने के बावजूद भी नई कविता में प्रवाह और गति दिखाई पड़ती है। नाद सौंदर्य इसमें एक अंत:संगीत उत्पन करता है,अर्थ के धरातल पर इसमें एक अंतर्लयता की गूंज उभरती है। कभी-कभी इन कविताओं में मात्राओं का मेल दिखाई पड़ता है लेकिन इससे इन्हें छंदोबद्ध नहीं माना जा सकता। वस्तुत: नई कविता मुक्तक छंद में नई संवेदना और नए विचार की सटीक अभिव्यंजना की एक कोशिश है।

रविवार, 12 अगस्त 2012

नई कविता

प्रयोगवाद व नई कविता में भेद रेखा स्पष्ट नहीं है। एक प्रकार से प्रयोगवाद का विकसित रूप ही नई कविता है। प्रयोगवाद को इसके प्रणेता अज्ञेय कोई वाद नहीं मानते। वे तार-सप्तक(1943) की भूमिका में केवल इतना ही लिखते हैं कि संगृहीत सभी कवि ऐसे होंगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हैं जो यह दावा नहीं करते कि काव्य का सत्य उन्होंने पा लिया है। केवल अन्वेषी ही अपने को मानते हैं।" साथ ही अज्ञेय ने यह भी स्पष्ट किया कि "वे किसी एक स्कूल के नहीं हैं,किसी मंजिल पर पहुंचे हुए नहीं हैं,अभी राही हैं-राही नहीं,राहों के अन्वेषी। उनमें मतैक्य नहीं है,सभी महत्त्वपूर्ण विषयों पर उनकी राय अलग-अलग है। इस प्रकार केवल काव्य के प्रति एक अन्वेषी का दृष्टिकोण उन्हें समानता के सूत्र में बांधता है। प्रयोगवाद नाम इस काव्य-विशेष के विरोधियों या आलोचकों द्वारा दिया गया। अज्ञेय ने प्रयोगवाद नाम का लगातार प्रतिवाद किया है। उनका कहना है कि "प्रयोग कोई वाद नहीं है-फिर भी आश्चर्य की बात है कि यह नाम व्यापक स्वीकृति पा गया। प्रयोग शब्द जैसे'एक्सपेरिमेंट का हिंदी पर्याय है वैसा ही 'एक्सपेरिमेंटलिज्म जैसा कोई समानांतर आधार नहीं मिलता है। इस प्रकार का कोई वाद यूरोपीय साहित्य में भी नहीं चला।" प्रगतिवादियों और नंददुलारे वाजपेयी ने अज्ञेय और प्रयोग की दृष्टि पर जो आक्षेप लगाए ,उनका करारा जवाब अज्ञेय ने दूसरा सप्तक(1951) और तीसरा सप्तक(1959) की भूमिकाओं में दिए हैं।

दूसरा सप्तक की भूमिका में यह स्पष्ट कहा गया कि "प्रयोगवाद कोई वाद नहीं है। इन कवियों को प्रयोगवादी कहना इतना ही सार्थक या निर्थक है जितना इन्हें कवितावादी कहना।" दूसरे सप्तक के अधिकांश कवियों के वक्तव्यों में नए कवियों का उल्लेख हुआ है और स्वयं अज्ञेय ने लिखा है कि " प्रयोग के लिए प्रयोग इन में से भी किसी ने नहीं किया है,पर नई समस्याओं और नए दायित्वों का तकाजा सब ने अनुभव किया है और उससे प्रेरणा सभी को मिली है। दूसरा सप्तक नए हिंदी काव्य को निश्चित रूप से एक कदम आगे ले जाता है।

सन 1951 में एक रेडियो गोष्ठी हुई थी,जिसमें सुमित्रानंदन पंत,भगवती चरण वर्मा,अज्ञेय,धर्मवीर भारती और शिवमंगल सिंह सुमन जैसे कवियों ने भाग लिया। इस गोष्ठी में नवीन प्रवृत्ति वाली कविता धारा के लिए प्रयोग शब्द का प्रयोग हुआ। लेकिन अज्ञेय ने तारसप्तकीय कविता के लिए नई कविता नाम की प्रस्तावना की। इसी  नाम को लेकर सन 1953 में "नए पत्ते" नाम से और सन 1954 में "नई कविता"नाम से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ। "नए पत्ते" का संपादन डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी और डॉ लक्ष्मीकांत वर्मा ने संभाला। "नई कविता" का संपादन दायित्व डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी और डॉ. जगदीश गुप्त ने उठाया। यहीं से प्रयोगवादी कही जाने वाली कविता को एक नया नाम "नई कविता" मिल गया। "नई कविता" 1954 से 1967 तक प्रकाशित होती रही। जो एक अर्धवार्षिक पत्रिका थी। इस पत्रिका में नए-नए कवियों को स्थान मिलने लगा। लक्ष्मीकांत       वर्मा,सर्वेश्वर,कुंवर नारायण,विपिन कुमार अग्रवाल और श्रीराम वर्मा जैसे कवि इस पत्रिका की ही देन हैं। इन कवियों की रचनाएं रघुवंश,विजयदेवनारायण साही,अज्ञेय जैसे काव्य मर्मज्ञों के लेखों के साथ प्रकाशित होती थी। जिसमें नवीन भावों को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाता था। अंधा-युग और कनुप्रिया के अंश सर्वप्रथम नई कविता में ही प्रकाशित हुए,जिनमें आधुनिक संवेदना की एक विशिष्ट पहचान मौजूद थी। संचयन स्तंभ के अंतर्गत अनेक युवा कवियों को स्थान मिला।

उल्लेखनीय है कि नई कविता का नामकरण अज्ञेय द्वारा ही किया गया है और वे इस नाम के अंतर्गत तार-सप्तकों के कवियों या बाद में परिमल, प्रतीक,नए पत्ते,नई कविता में स्थान पाने वाले कवियों की रचनाओं के लिए करना अधिक सही पाते हैं,बजाय प्रयोगवाद के।

इस नाम को अपनाने से जहां समसामयिक युग बोध का बोध होता है वहीं पूर्ववर्ती कवियों से विषय-वस्तु और शैली की भिन्नता भी स्पष्ट हो जाती है। वास्तव में यह नाम सन 1930 में लंदन में ग्रियर्सन द्वारा न्यू वर्स(New Verse) नाम से संपादित पत्रिका का अक्षरश: हिंदी अनुवाद है। दूसरे महायुद्ध के कुछ वर्ष पूर्व से ही यूरोपीय साहित्य में,विशेषकर फ्रेंच और अंग्रेजी में परम्परा से मुक्त,नए ढ़ग की कविताओं का चलन शुरु हो गया था। इनमें जहां एक ओर बुद्धिवाद का आधार लिया गया वहीं दूसरी ओर वस्तुवाद पर आधारित भावात्मक प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति भी थी। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि 'इलियट' तथा 'लारेंस' में ये दोनों विशेषताएं देखी जा सकती हैं। अंग्रेजी के मार्क्सवादी कवि 'ओडेन' का नाम भी इस नए आंदोलन के साथ जुड़ा है। सन 1950 के  आसपास विदेशों में समसामयिक कविता को नई कविता(New Poetry ) कहने का रिवाज़ चला। जी.एस.फेजर ने समसामयिक कविता को न्यूमूवमैंटस कहा। डेनाल्ड हाल ने अमरीका की विगत 15 वर्षों की कविता में प्रगति को "न्यू पोइट्री" कहा। अन्य यूरोपीय व एशियाई देशों में भी नई पीढ़ी की काव्य रचना को नूतन नामों द्वारा अभिहित किया गया। भारत में भी यह हवा आई और अब तक प्रयोगवादी नाम से बदनाम कविता नई कविता हो गई।

कुछ आलोचक नई कविता और प्रयोगवाद को अलग करने के लिए "नई कविता" को समाजोन्मुख मानते हैं,जबकि प्रयोगवाद को घोरअहंनिष्ठ। उनके अनुसार नई कविता में सामाजिक तनावों.सामाजिक मूल्यों,सामाजिक वैषम्यों और कुंठाओं को स्वस्थ अभिव्यक्ति मिली है जबकि प्रयोगवाद में यह पूर्णत: वैयक्तिक और नग्न थी और समाज से पूरी तरह कटी हुई थी। नई कविता समाज सापेक्ष बनी है,जबकि प्रयोगवादी कही जाने वाली कविता पूर्णत: समाज-निरपेक्ष थी। डॉ. धर्मवीर भारती ने लिखा है कि "प्रयोगवादी कविता में भावना है,किंतु हर भावना के आगे प्रश्न चिह्न लगा है। इसी प्रश्न चिह्न को आप बौद्धिकता कह सकते हैं।" परंतु नई कविता प्रयोगवाद की अगली कड़ी इस अर्थ में है कि अब कवियों ने प्रश्न-चिह्नों के उस आवरण को उतार फैंका है। अब यह कविता प्रश्न चिह्न मात्र न रहकर समाज और जीवन के व्यापक सत्यों को खंड-खंड चित्रों के रूप में ही सही साधारणीकृत होकर समग्र प्रकार की सम्प्रेषणीयता से अन्वित हो गई है। इसमें साधारणीकरण की समस्या अब नहीं रह गई है।

कविता के पुराने आचार्यों और समीक्षकों व आलोचकों ने नई कविता का बड़ा भारी विरोध किया। यह विरोध छायावाद भी झेल चुका था और प्रयोगवाद भी। लेकिन नई कविता ने मूल्यबोध की जो समस्याएं उठाई,उसके सम्मुख पुरानी पीढ़ी को पस्त होना पड़ा। डॉ.लक्ष्मीकांत वर्मा ने पुराने आलोचकों को जवाब देने के लिए "नई कविता के प्रतिमान" पुस्तक लिखी। जिस पर व्यापक चर्चा हुई। 'अर्थ की लय', 'रसानुभूति और सहानुभूति','लघुमानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस' जैसे निबंधों से आलोचना के क्षेत्र के दिग्गज़ आलोचक भी भौचका रह गए। रस सिद्धांत को चुनौती देकर कहा गया कि कविता का नया सोंदर्य बोध अब रस प्रतिमान से नहीं समझा-समझाया जा सकता है क्योंकि रस का आधार है अद्वंद्व,समाहिति,संविद विश्रांति जबकि नई कविता का आधार है द्वंद्व,तनाव,घिराव,संघर्ष,बेचैनी,चित्त की व्याकुलता,बौद्धिक तार्किक स्थिति। नई कविता भाव केंद्रित न होकर विभाव या विचार के तनाव की कविता है जिससे जीवन जगत के वास्तविक दुखते-कसकते अनुभवों को स्थान मिलता है। इस प्रकार नई कविता आन्दोलन में काव्य की अंतर्वस्तु,प्रयोग-परम्परा-आधुनिकता,समसामयिकता,प्रतीक,काव्य-बिम्ब,अर्थ की लय,काव्य-य़ात्रा की सर्जनात्मकता, मिथक आदि पर नए ढ़ग से विचार किया गया।

नई कविता के अधिकांश कवि तार-सप्तकों के ही कवि हैं तथा प्रयोगवादी और नई कविता में बहुत कुछ समतापरक होने पर भी साठोत्तरी कवियों ने नई कविता को प्रयोगवाद के पर्यायवाची के रूप में स्वीकार नहीं किया और उसे अनेक नाम देकर प्रयोगवाद से अलग ठहराया।

अब नई कविता पर कुछ विद्वानों की दृष्टि पर  नजर डालें:-
डॉ. रघुवंश : नई कविता में अन्वेषण की दिशा में नए क्षितिज उभर आए हैं, यथार्थ को नई दृष्टि मिली है,संक्रमण के बीच नए मूल्यों की संभावना आभासित हुई है,साथ ही भाव-बोध के नए स्तरों और आयामों को उद्-घाटित करने के लिए उपयुक्त भाषा-शैली तथा शिल्प की उपलब्धि भी हुई है।

डॉ. यश गुलाटी : यह नया नाम वास्तव में उन कविताओं के लिए रुढ़ हो गया है जो आजादी के बाद बदले हुए परिवेश में जिंदगी की जटिल और चकरा देने वाली वास्तविकताओं को झेल रहे मानव की परिवर्तित संवेदनाओं को नए मुहावरों में अभिव्यक्त करती हैं।

डॉ. रामदरश मिश्र : नई कविता भारतीय स्वतंत्रता के बाद लिखी गई उन कविताओं को कहा गया जिनमें परम्परागत कविता से आगे भावबोधों की अभिव्यक्ति के साथ ही नए मूल्यों और नए शिल्प विधान का अन्वेषण किया गया है।

डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त : नई कविता नए समाज के,नए मानव की,नई वृत्तियों की,नई अभिव्यक्ति,नई शब्दावली में है,जो नए पाठकों के नए दिमाग पर नए ढ़ग से नया प्रभाव उत्पन्न करती है।

डॉ. जगदीश गुप्त : वह नई कविता उन प्रबुद्ध विवेकशील आस्वादकों को लक्षित करके लिखी जा रही है,जिनकी मानसिक अवस्था और बौद्धिक-चेतना नए कवि के समान है--बहुत अंशों में कवि की प्रगति ऐसे प्रबुद्ध भावुक वर्ग पर आश्रित रहती है। 

शनिवार, 4 अगस्त 2012

प्रयोगवाद के कवि और उनकी रचनाएं

प्रयोगवाद के कवियों में हम सर्वप्रथम तारसप्तक के कवियों को गिनते हैं और इसके प्रवर्तक कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ठहरते हैं। जैसा कि हम पहले कह आए हैं कि तारसप्तक 1943 ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें सातकवियों को शामिल किए जाने के कारण इसका नाम तारसप्तक रखा गया। इन कवियों को अज्ञेय ने पथ के राही कहा। ये किसी मंजिल पर पहुंचे हुए नहीं हैं,बल्कि अभी पथ के अन्वेषक हैं। इसी संदर्भ में अज्ञेय ने प्रयोग शब्द का प्रयोग किया, जहां से प्रयोगवाद की उत्पत्ति स्वीकार की जाती है। इसके बाद 1951 ई. में दूसरा,1959 ई में तीसरा और 1979 में चौथा तारसप्तक प्रकाशित हुए। जिनका संपादन स्वयं अज्ञेय ने किया है। आइए,सर्वप्रथम हम इन चारों तारसप्तकों के कवियों के नामों से परिचित हो लें।

1. तारसप्तक के कवि: अज्ञेय,भारतभूषण अग्रवाल,मुक्तिबोध,प्रभाकर माचवे,गिरिजाकुमार माथुर,नेमिचंद्र जैन,रामविलास शर्मा।

2. दूसरे तारसप्तक के कवि: भवानीप्रसाद मिश्र, शंकुत माथुर, नरेश मेहत्ता,रघुवीर सहाय,शमशेर बहादुर सिंह,हरिनारायण व्यास,धर्मवीर भारती।

3. तीसरे तारसप्तक के कवि: प्रयागनारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, केदारनाथ सिंह,कुंवर नारायण, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना।

4. चौथे तारसप्तक के कवि : अवधेश कुमार, राजकुमार कुंभज ,स्वदेश भारती, नंद किशोर आचार्य,सुमन राजे, श्रीराम शर्मा, राजेन्द्र किशोर।

प्रयोगवाद में ही शामिल है नकेनवाद या प्रपद्यवाद। नकेनवाद के कवि हैं: 1.नलिनविलोचन शर्मा 2.केसरी कुमार 3.नरेश।

अब हम इन कवियों की काव्य-रचनाओं से परिचित हों। 

1. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय(1911-1987): 1.भग्नदूत 2.चिंता 3.हरी घास पर क्षण भर 4.बावरा अहेरी 5.अरी ओ करुणा प्रभामय 6.आंगन के पार द्वार 7. इत्यलम 8. इंद्र-धनुष रौंदे हुए थे 9.सुनहले शैवाल 10.कितनी नावों में कितनी बार 11.सागर-मुद्रा 12.क्योंकि मैं उसे जानता हूं 13.पहले सन्नाटा बुनता हूं 14.महावृक्ष के नीचे 15.नदी की बांक पर छाया।

2. भारतभूषण अग्रवाल(1919-1975): 1.छवि के बंधन 2.जागते रहो 3.मुक्ति-मार्ग 4.एक उठा हुआ हाथ 5.ओ अप्रस्तुत मन 6.कागज के फूल 7.अनुपस्थित लोग 8.उतना वह सूरज है।

3. गजानन माधव मुक्तिबोध(1917-1964): 1.चांद का मुंह टेढ़ा है 2.भूरी-भूरी खाक धूल।

4.प्रभाकर माचवे(1917-       ): 1.स्वप्न-भंग 2.अनुक्षण 3.तेल की पकौड़ियां 4.मेपल।

5. गिरिजाकुमार माथुर(1919-1994     ): 1.नाश और निर्माण 2.धूप के धान 3.शिला पंख चमकीले 4.मंजीर 5.भीतरी नदी की यात्रा 6.जो बंध नहीं सका 7. छाया मत छूना मन 8.साक्षी रहे वर्तमान 9.कल्पांतर।

6.नेमिचंद्र जैन(1918- ):विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।

7.राम विलास शर्मा( ): 1.रूप-तरंग (ये प्रयोगवादी से अधिक प्रगतिवादी कवि हैं और मार्क्सवादी समीक्षक व आलोचक हैं)

8. भवानीप्रसाद मिश्र(1914-1985): 1.गीत-फरोश 2.अंधेरी कविताएं 3.चकित हैं दु:ख 4.त्रिकाल संध्या 5.बुनी हुई रस्सी 6.गांधी पंशशती 7.खुशबू के शिलालेख 8.त्रिकाल संध्या 9.अनाम तुम आते हो 10.परिवर्तन जिए 11.मानसरोवर दिन

9.शकुंत माथुर(1922- ): 1.चांदनी चूनर 2.सुहाग बेला 3.कूड़े से भरी गाड़ी।

10.नरेश मेहता(1927- ): 1.बोलने दो चीड़ को 2.मेरा समर्पित एकांत 3.वनपाखी सुनो 4.संशय की एक रात 5.उत्सवा।

11.रघुवीर सहाय(1929-  ): 1.सीढ़ियों पर धूप में 2.आत्महत्या के विरुद्ध 3.हंसो हंसो जल्दी हंसो 4.लोग भूल गए हैं।

12.शमशेर बहादुर सिंह(1911-1993): 1.चुका भी नहीं हूं मैं 2.ददिता 3.बात बोलेगी हम नहीं 4.कुछ कविताएं 5.कुछ और कविताएं 5.इतने पास अपने।

13.हरिनारायण व्यास( ): 1.मृग और तृष्णा 2.त्रिकोण पर सूर्योदय।

14.धर्मवीर भारती(1926-1997): 1.कनुप्रिया 2.ठंडा लोहा 3.सात गीत वर्ष 4.अंधा-युग।

15.प्रयाग नारायण त्रिपाठी(   ):विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।

 16.कीर्ति चौधरी(1935- ): 1.खुले हुए आसमान के नीचे 2.कविताएं

17. मदन वात्स्यायन(  ):1.अपथगा 2.शुक्रतारा।

18.केदारनाथ सिंह(1934-  ): 1.अभी बिल्कुल अभी 2.जमीन पक रही है 3.यहां से देखो

19.कुंवर नारायण(1927-  ): 1.चक्र-व्यूह 2.आत्मजयी 3.परिवेश 4.हम-तुम 5.आमने-सामने।

20.विजय देव नारायण साही(1924-   ): 1.मछली-घर 2.साखी ।

21.सर्वेश्वर दयाल सक्सेना(1927-1984  ): 1.काठ की घंटियां 2.एक सूनी नाव 3.गर्म-हवाएं 4.बांध का पुल 5.जंगल का दर्द 6.कुआनो नदी 7.बांस के पुल 8.कविताएं-1,   9.कविताएं-2,   10.खूंटियों पर टंगे लोग।

22.नलिन विलोचन शर्मा(   ):नकेन प्रपद्य

23.केसरी कुमार( ):  नकेन प्रपद्य

24.नरेश(     ): नकेन प्रपद्य

तार-सप्तक परम्परा के अतिरिक्त कुछ अन्य भी प्रयोगवादी कवि हैं: चंद्रकुंवर वर्त्वाल,राजेन्द्र यादव,सूर्यप्रताप। तार सप्तक परंपरा के सभी कवि प्रयोगवादी हों,ऐसी बात भी नहीं है। रामविलास शर्मा और भवानीप्रसाद मिश्र पर प्रगतिवाद का पर्याप्त प्रभाव है। इधर मुक्तिबोध में एक अलग ही तरह का विस्फोटक तत्व मौजूद है।

रविवार, 22 जुलाई 2012

प्रयोगवादी कविता की प्रवृत्तियां

प्रयोगवादी कविता में मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रवृत्तियां देखी गई हैं:-

1. समसामयिक जीवन का यथार्थ चित्रण: प्रयोगवादी कविता की भाव-वस्तु समसामयिक वस्तुओं और व्यापारों से उपजी है। रिक्शों के भोंपू की आवाज,लाउड स्पीकर का चीत्कार,मशीन के अलार्म की चीख,रेल के इंजन की सीटी आदि की यथावत अभिव्यक्ति इस कविता में मिलेगी। नलिन विलोचन शर्मा ने बंसत वर्णन के प्रसंग में लाउड स्पीकर को अंकित किया। प्रत्युष-वर्णन में उन्होंने रिक्शों के भोंपू की आवाज का उल्लेख किया। एक अन्य स्थल पर रेल के इंजन की ध्वनि का उल्लेख हुआ। मदन वात्स्यायन ने कारखानों में चलने वाली मशीनों की ध्वनि का ज्यों का त्यों उल्लेख किया है। समसामयिकता के प्रति इनका इतना अधिक मोह है कि इन कवियों ने उपमान तथा बिम्बों का चयन भी समसामयिक युग के विभिन्न उपकरणों से किया है। भारत भूषण अग्रवाल ने लाउड स्पीकर तथा टाइपराइटर की की को उपमान के रूप प्रस्तुत किया। रघुवीर सहाय ने भी पहिये और सिनेमा की रील के उपमानों को ग्रहण किया है। केसरी कुमार ने व्यवसायिक जीवन के उपमानों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार चिकित्सा तथा रसायन-शास्त्र से अनेकों उपमान प्रयोगवादी कवियों ने ग्रहण किए हैं। गिरिजाकुमार माथुर की हब्श देश नामक कविता की निम्न पंक्तियां देखिए जिनमें औद्योगिक और रासायनिक युग को वाणी प्रदान की गई है:-
उगल रही हैं खानें सोना,
अभ्रक,तांबा,जस्त,क्रोनियम
टीन,कोयला,लौह,प्लेटिनम
युरेनियम,अनमोल रसायन
कोपेक,सिल्क,कपास,अन्न-धन
द्रव्य फोसफैटो से पूरित! 
2. घोर अहंनिष्ठ वैयक्तिकता:- प्रयोगवादी कवि समाज-चित्रण की अपेक्षा वैयक्तिक कुरूपता का प्रकाशन करके समाज के मध्यमवर्गीय मानव की दुर्बलता का प्रकाशन करता है। मन की नग्न एवं अश्लील वृत्तियों का चित्रण करता है। अपनी असामाजिक एवं अहंवादी प्रकृति के अनुरूप मानव जगत के लघु और क्षुद्र प्राणियों को काव्य में स्थान देता है। भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता की प्रतिष्ठा करता है। कवि के मन की स्थिति,अनुभूति,विचारधारा तथा मान्यता इस कविता में विशेष रूप से अभिव्यक्त हुई है। व्यक्ति का केवल सामाजिक अस्तित्व ही नहीं है,बल्कि उसकी अपनी भावनाओं का भी एक संसार है। इसलिए इस कविता में अधिक ईमानदारी के साथ कवि के निजी दर्द अभिव्यक्त हुए हैं।
 मेरी अंतरात्मा का यह उद्वेलन- 
 जो तुम्हें और तुम्हें और तुम्हें देखता है
 और अभिव्यक्ति के लिए तड़प उठता है-
 यही है मेरी स्थिति,यही मेरी शक्ति। 
 .....................
चलो उठें अब
अब तक हम थे बंधु
सैर को आए-
और रहे बैठे तो
लोग कहेंगे
धुंधले में दुबके दो प्रेमी बैठे हैं
वह हम हों भी
तो यह हरी घास ही जाने                          (अज्ञेय)
3. विद्रोह का स्वर: इस कविता में विद्रोह का स्वर एक ओर समाज और परम्परा से अलग होने के रूप में मिलता है और दूसरी ओर आत्मशक्ति के उद्-घोष रूप में। परम्परा और रूढ़ि से मुक्ति पाने के लिए भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं:-
ये किसी निश्चित नियम,क्रम की सरासर सीढ़ियां हैं
पांव रखकर बढ़ रहीं जिस पर कि अपनी पीढ़ियां हैं
बिना सीढ़ी के बढ़ेंगे तीर के जैसे बढ़ेंगे.
विद्रोह का दूसरा रूप चुनौती और ध्वंस की बलवती अभिव्यक्ति के रूप में मिलता है। भारत भूषण अग्रवाल में स्वयं का ज्ञान अधिक प्रबल हो उठा कि वे नियति को संघर्ष की चुनौती देते हुए कहते हैं:-
मैं छोड़कर पूजा
क्योंकि पूजा है पराजय का विनत स्वीकार-
बांधकर मुट्ठी तुझे ललकारता हूं
सुन रही है तू?
मैं खड़ा यहां तुझको पुकारता हूं।
आततायी सामाजिक परिवेश को चुनौती देते हुए अज्ञेय कहते हैं:
ठहर-ठहर आततायी! जरा सुन ले
मेरे क्रुद्ध वीर्य की पुकार आज सुन ले। 
वैज्ञानिक युग ने उसे पुराने चरित्रों के प्रति शंकित किया है,इसलिए वह उनके प्रति कोई श्रद्धा नहीं रखता। इस कविता के कवि को ईश्वर,नियति,मंदिर,दैवी-व्यक्तियों एवं स्थानों में विश्वास नहीं है। वह स्वर्ग और नरक का अस्तित्व नहीं मानता। भारत भूषण अग्रवाल की निम्न पंक्तियां देखिए-
रात मैंने एक स्वपन देखा
मैंने देखा
कि मेनका अस्पताल में नर्स हो गई
और विश्वामित्र ट्यूशन कर रहें हैं
उर्वशी ने डांस स्कूल खोल लिया है
गणेश टॉफ़ी खा रहे हैं
4. लघु मानव की प्रतिष्ठा: प्रयोगवादी काव्य में लघु मानव की ऐसी धारणा को स्थापित किया गया है जो इतिहास की गति को अप्रत्याशित मोड़ दे सकने की क्षमता रखता है; धर्मवीर भारती की ये पंक्तियां देखिए:-
मैं रथ का टूटा पहिया हूं
लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले
इस कविता में मानव के लघु व्यक्तित्व की उस शक्ति पर गौरव तथा अभिमान अभिव्यक्त हुआ है जो व्यक्ति की महत्ता की चरम सीमा का स्पर्श करती है।

5. अनास्थावादी तथा संशयात्मक स्वर: डॉ. शंभूनाथ चतुर्वेदी ने अनास्थामूलक प्रयोगवादी काव्य के दो पक्ष स्वीकार किए हैं। एक आस्था और अनास्था की द्वंद्वमयी अभिव्यक्ति,जो वस्तुत: निराशा और संशयात्मक दृष्टिकोण का संकेत करती है। दूसरी,नितांत हताशापूर्ण मनोवृत्ति की अभिव्यक्ति।
कुंठा एक अनास्थामूलक वृत्ति है। प्रयोगवादी कवि अपनी कुंठाओं और वासनाओं को छिपाने में विश्वास नहीं रखता,इसलिए वह इनका नग्न रूप प्रस्तुत कर देता है। धर्मवीर भारती की निम्नांकित की पंक्तियां देखिए:
अपनी कुंठाओं की
दीवारों में बंदी
मैं घुटता हूं
प्रयोगवादी कविता में पस्ती,पराजय और अविश्वास की अभिव्यक्ति के रूप में भी अनास्था को प्रमुख स्थान मिला है। विजयदेव नारायण साही ने भी व्यक्ति या समाज को आक्रांत करने वाली अनास्था का भी स्पष्ट प्रकाशन किया है,और संपूर्ण समाज अथवा व्यक्ति विशेष से अनास्था के तत्वों को ग्रहण करने का भी संदेश दिया है-
हर आंसू कायरता की खीझ नहीं होता
बाहर आओ
सब साथ मिलकर रोओ

6. आस्था तथा भविष्य के प्रति विश्वास:  जहां प्रयोगवाद के कुछ कवियों ने अनास्थावादी और संशयात्मकता को स्वर दिए वहीं कुछ अन्य कवियों ने जैसे नरेश मेहता तथा रघुवीर सहाय ने काव्य में अनास्थामूलक तत्वों को अनावश्यक पाया। गिरिजाकुमार माथुर के काव्य में आस्था के बल पर नव-निर्माण का स्वर मुखरित हुआ है। हरिनारायण व्यास तथा नरेश मेहता में भी आस्थामूलक वृत्तियों के प्रति आग्रह है। आस्था का पहला रूप पुरोगामी संकल्प का सूचक है।अज्ञेय की कुछ कविताओं में भी आस्था की सफल अभिव्यक्ति हुई है-
मैं आस्था हूं
तो मैं निरंतर उठते रहने की शक्ति हूं

...    ...    ...
जो मेरा कर्म है,उसमें मुझे संशय का नाम नहीं
वह मेरी अपनी सांस-सा पहचाना है
आस्था के दूसरे रूप में सर्जन-शक्ति अथवा कर्म-निष्ठा की भावना रहती है। अन्यत्र अज्ञेय ने आस्था के माध्यम से पूर्णता के उच्चतम धरातल पर प्रतिष्ठित होने की बात का संकेत किया है-
आस्था न कांपे,मानव फिर मिट्टी का भी देवता हो जाता है.
7. वेदना की अनुभूति का प्रयोग: प्रयोगवादी कवि वेदना से पालायन न करके,उसके सान्निध्य की अभिलाषा करते हैं। इसे उसने दो रूपों में स्वीकार किया है-एक तो वेदना को सहन करने की लालसा और दूसरे वेदना या पीड़ा की अतल गहराइयों में बैठ कर नए अर्थ की उपलब्धि के रूप में। भारत भूषण अग्रवाल वेदना को उत्साहवर्धिनी मानते हैं:
पर न हिम्मत हार
प्रज्वलित है प्राण में अब भी व्यथा का दीप
ढाल उसमें शक्ति अपनी
लौ उठा 
मुक्तिबोध की मान्यता है कि वेदना अथवा पीड़ा के अवशेष मानव की संघर्ष-शक्ति को उभारते हैं।

8.समष्टि कल्याण की भावना: इस कविता में व्यष्टि के सुख की अपेक्षा समष्टि के कल्याण को अधिक महत्त्व दिया गया है। रघुवीर सहाय सूर्य से धरती के जीवन को मंगलमय बनाने की प्रार्थना करते हुए कहते हैं:
आओ स्वीकार निमंत्रण यह करो
ताकि, ओ सूर्य,ओ पिता जीवन के
तुम उसे प्यार से वरदान कोई दे जाओ
जिससे भर जाये दूध से पृध्वी का आंचल
जिससे इस दिन उनके पुत्रों के लिए मंगल हो
समष्टि हित के लिए कवि अपने व्यक्तिवाद तथा अहं का विसर्जन करने को भी तत्पर है।अज्ञेय का अकेला मदमाता दीपक अहं का प्रतीक है।उसे वे पंक्ति को समर्पित करने के लिए कहते हैं-
यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता,पर
इसको भी पंक्ति को दे दो
9.वासना की नग्न अभिव्यक्ति:  छायावादी कल्पना में प्रकृति के अनेक रूप-रंगों का चित्रण था,प्रगतिवाद की कविता में सामाजिक यथार्थ की प्रवृति रही तो प्रयोगवादी कविता में फ्रायड के मनोविश्लेषण के प्रभाव से नग्न यथार्थवाद का चित्रण इस कविता में हुआ। इस में साधनात्मक प्रेम का अभाव है मांसल प्रेम एवं दमित वासना की अभिव्यक्ति ही अधिक हुई है। प्रयोगवादी कवि अपनी ईमानदारी अपनी यौनवर्जनाओं के चित्रण में प्रदर्शित करता है। जब वह ऐसा करता है तो सेक्स को समस्त मानव प्रवृत्तियों और प्रेरणाओं का केंद्र-बिंदु मानता है। कुंवरनारायण ने य़ौनाशय को अत्यधिक महत्त्व दिया-
आमाशय
यौनाशय
गर्भाशय
जिसकी जिंदगी का यही आशय
यहीं इतना भोग्य
कितना सुखी है वह
भाग्य उसका ईर्ष्या के योग्य
धर्मवीर भारती ने तो संभोग-दशा का स्पष्ट चित्र ही उतार दिया है-
मैंने कसकर तुम्हें जकड़ लिया है
और जकड़ती जा रही हूंऔर निकट,और निकट
            ...    ...       ...
         और तुम्हारे कंधो पर,बांहों पर,होठों पर
         नागवधू की शुभ्र दंत-पंक्तियों के 
         नीले-नीले चिह्नउभर आये हैं --

इसी प्रकार एक उदाहरण और देखिए--
नंगी धूप,चूमते पुष्ट वक्ष
दूधिया बांहें रसती केसर-फूल
चौड़े कर्पूरी कूल्हों से दबती
सोफे की एसवर्गी चादर
रेशम जांघों से उकसीं
टांगों की चंदन डालें
10.क्षण की अनुभुति: प्रयोगवादी कविता में क्षण विशेष की अनुभूति को यथारूप प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति है। इस युग का कवि क्षण में ही संपूर्णता के दर्शन करता है-
एक क्षण: क्षण में प्रवाहमान
व्याप्त संपूर्णता
इस से कदापि बड़ा नहीं था महबुधि जो--
पिया था अगस्त्य ने। 
जीवन के ये क्षण सुख-दुख,संयोग-वियोग,आशा-निराशा किसी भी रूप में हो सकते हैं। इस लिए इस कविता में विविधता व विरोधी प्रवृत्तियां एक साथ समाविष्ट हो गई हैं। धर्मवीर भारती की कविता में विरोधी अनुभूतियों का(आध्यात्मिक एवं भौतिक)सुंदर समन्वय हुआ है।

फूल झर गए
क्षण भर की ही तो देरी थी
अभी अभी तो दृष्टि फेरी थी
इतने में सौरभ के प्राण हर गए
फूल झर गए
10. भदेसपन : प्रयोगवादी कवियों ने प्रयोग की लालसा में उन सभी कुरुचियों,विकृतियों तथा भद्दे दृश्यों को भी कविता में चित्रित किया है जो जीवन और समाज में व्याप्त रहें हैं,लेकिन उपेक्षित। इन्हें चित्रित करने के पीछे प्रयोगवादी कवियों का तर्क है कि जीवन में सभी कुछ सुंदर नहीं होता,बल्कि असुंदर और घृणित वस्तु तथा दृश्य भी जीवन से जुड़े रहते हैं। इसलिए जीवन की पूर्णता में ये त्याज्य नहीं हैं और घिनौनी चीजों में सौंदर्य देखने के लिए विशेष साधना अपेक्षित है। इससे कविता में जुगुप्सा उत्पन्न होती है। अज्ञेय की कविता का एक उदाहरण देखिए-
निकटतर धंसती हुई छत,आड़ में निर्वेद
मूत्र-सिंचित मृत्तिका के वृत्त में
तीन टांगों पर खड़ा नत ग्रीव
धैर्य,धन,गदहा 
11. व्यंग्य :व्यंग्य का गहरा पुट इस कविता की विशेषता रही है। आधुनिक जीवन की विसंगतियों पर,लोगों के बदलते हुए रूपों पर,सभ्यता के नाम पर फैले शोषण पर,राजनीति की कुटिल चालों पर,धर्म के व्यापारों पर,यह कविता व्यंग्य करती है। आज के जीवन का खोखलापन,स्वार्थपरता का भाव कवि के मन को खीझ से भर देता है। इसलिए वह इन पर गहरा व्यंग्य करता है। अज्ञेय की कविता सांप में शहरी सभ्यता पर करारा व्यंग्य है--
सांप तुम सभ्य ति हुए नहीं,न होगे,
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूं! उत्तर दोगे!
फिर कैसे सीखा डसना
विष कहां पाया।  
12.काव्य शिल्प में नए प्रयोग:  शिल्प के क्षेत्र में प्रयोगवादी कवियों के काव्य में अपूर्व क्रांति दिखाई पड़ती है। मुक्तिबोध के काव्य में वक्रता से सरलता की ओर जाने की प्रवृत्ति संकेतों के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है। गिरिजाकुमार माथुर ने काव्य में विषय की अपेक्षा टेकनिक पर अधिक ध्यान दिया। भाषा,ध्वनि तथा छंद-विधान में उन्होंने नवीन प्रयोग किए। प्रभाकर माचवे ने नई अलंकार- योजना,बिम्ब-विधान और उपमानों के नए प्रयोग किए। अज्ञेय ने साधारणीकरण की दृष्टि से भाषा संबंधी नवीनता को अधिक महत्त्व दिया। शमशेरबहादुर सिंह ने फ्रांसीसी प्रतीकवादी कवियों के प्रभाव में पर्याप्त प्रयोग किए,जिनके कारण उन्हें कवियों का कवि कहा जाने लगा। स्पष्ट है कि प्रयोगवादी कवियों ने भाषा,लय,शब्द,बिम्ब तथा छंद-विधान संबंधी नए प्रयोगों पर बहुत ध्यान दिया।

13. बिम्ब योजना: प्रयोगवादी कविता में बिम्ब-योजना बड़ी सफलता के साथ की गई है। इस कविता से पूर्व की किसी कविता में इतने अधिक स्पष्ट बिम्ब उतरें हैं,इसमें संदेह है। बिम्ब योजना के विषय में प्रयोगवादियों की बहुत बड़ी विशेषता यह है कि इनके बिम्ब नितान्त सजीव हैं। प्राकृतिक-बिम्बों का एक उदाहरण द्रष्टव्य है:-
बूंद टपकी एक नभ से
किसी ने झुककर झरोखे से
कि जैसे हंस दिया हो
यहां बूंद टपकने और झरोखे से झांककर हंसने में सादृश्य दिखाया गया है।झरोखे से हँसी देखने के लिए निगाह ऊपर उठती है और टपकती बूंद भी आकाश की ओर बरबस नेत्रों को खींच लेती है। इस बिम्ब में अनुभूति की सूक्ष्मता तथा गहराई दर्शनीय है।

14.नए उपमान : अप्रस्तुत-योजना में प्रयोगवादी कवियों ने पुराने उपमानों का पूर्णत: परित्याग कर दिया है। इनके उपमान एकदम नए हैं। इनके अप्रस्तुत-विधान की प्रमुख विशेषता यह है कि वे जीवन से गृहीत हैं,उनकी संयोजना के लिए कल्पना के पंखों पर नहीं उड़ा गया है। उदाहरण के लिए प्रभाकर माचवे की ये दो पंक्तियां देखिए-
नोन-तेल लकड़ी की फिक्र में लगे घुन से
मकड़ी के जाले से,कोल्हू के बैल से ।
उपमान की नवीनता मुक्तिबोध की इन पंक्तियों में भी देखते ही बनती है,जिनमें उन्होंने नेत्रों के लिए लालटेन और पांवों के लिए स्तम्भ के उपमानों को चुना है-
अंतर्मनुष्य
रिक्त सा गेह
दो लालटेन से नयन
निष्प्राण स्तम्भ
दो खड़े पांव  
कुछ और उदाहरण देखिए-
प्यार का नाम लेते ही
 बिजली के स्टोव सी
 जो एकदम सुर्ख हो जाती है  
X   X   X    X   X   X    X
आपरेशन थियेटर सी
जो हर काम करते हुए चुप है 
15.  असंगत अनुषंग का प्रयोग : इलियट के काव्य-स्वरूप प्रयोगवादी कवियों में असंगत अनुषंगो(फ्री एशोसिएशंस) की भरमार मिलती है,जिससे इनका काव्य अत्यधिक दुरुह हो गया है। जहां पर ये कवि असंगत अनुषंगों का प्रयोग करने लग जाते हैं,वहां पर इनकी विचारधारा में पूर्वापर का संबंध न होने के कारण किसी एक निश्चित अर्थ पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। प्रयोगवादी कविता में सर्वप्रथम इस प्रवृत्ति का अवतरण अज्ञेय ने किया उसके बाद इसका बहुत अधिक प्रयोग होने लगा। असंगत अनुषंग अथवा असंबद्धता के लिए यहा नरेश की कुछ पंक्तियां उद्धृत हैं--
ई से ईश्वर
उ से उल्लू--
मां जी ?
नहीं जी 
वह पंछी
जो देखता है रात भर 
प्रस्तुत पंक्तियों का वड़ी माथा-पच्ची करने पर ही यह अर्थ निकाला जा सकता है कि कवि किसी कार्य में व्यस्त है कि इतने में उसका बच्चा ई से ईश्वर,उ से उल्लू रटता हुआ उसके पास आता है और सहसा कवि से अपनी मां जी के विषय में प्रश्न करता है। कवि संभवत: यह समझता है कि लड़का कदाचित यह पूछना चाहता है कि क्या मां उल्लू हैं? कवि प्रश्न को जैसा समझता है,उसके अनुसार उत्तर देता हुआ कहता है कि नहीं मां जी उल्लू नहीं हैं। उल्लू तो एक पक्षी है जो रात भर देखता है। स्पष्टत: असंगत अनुषंग प्रयोगवादी कविता को समझने में बड़ी बाधा उत्पन्न करते हैं। इसमें साधारणीकरण का सर्वधा अभाव है।

16. नवीन शब्द-चयन :एक ओर शब्द चयन में प्रयोगवादी कवि बहुत उदारता के साथ ग्रामीण,देशज तथा प्रचलित शब्दों को अपनाता है वहीं दूसरी ओर संस्कृत और अंग्रेजी का व्यापक प्रयोग भी करता है। व्याकरण के नियमों से चिपक कर रहना भी उसे सह्य नहीं। अत: भाषा के एक नए ढ़ग का नयापन आ गया है। इसमें नए क्रियापद भी बनते हैं। नए शब्दों में बतियाना,लम्बायित,बिलमान,अस्मिता,ईप्सा,क्लिन्त,इयत्ता,पारमिता आदि। इस प्रकार शब्दों को तोड़ा मरोड़ा गया है। इसके अलवा इन कवियों ने विज्ञान,दर्शन,मनोविज्ञान से भी शब्द ग्रहण किए हैं।

17. नवीन-प्रतीक : आज के जीवन और जगत के साथ-साथ आम आदमी को,वैज्ञानिक क्रियाओं को,शब्दों और प्रभावों को प्रयोगवादी कविता में स्थान दिया गया है। मनोविज्ञान से भी प्रतीक चुने गए हैं। कवियों ने सर्वथा पुराने प्रतीकों को त्याग कर नवीन प्रतीकों को ग्रहण किया है। मुक्तिबोध के प्रतीकों में ब्रह्मराक्षक,ओरांग-उटांग,गांधी,सुभाष,तिलक,रावण,वटवृक्ष आदि प्रसिद्ध प्रतीक हैं। नए प्रतीक जैसे प्यार का बल्ब फ्यूज हो गया, भी देखे जाते हैं।

18.छंद-विधान : प्रयोगवादियों ने छंद-विधान में तो आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया है। यहां विभिन्न तरह के प्रयोग हुए हैं। छंदों के परम्परागत मात्रिक रूपों से उसका कोई संबंध नहीं रह गया है। इससे कविता में कभी लय और गति का अभाव उत्पन्न होता है और कभी उसमें काव्यात्मकता के स्थान पर गद्यात्मकता आ जाती है। एक ओर लोकगीतों की धुनों के आधार पर कविताओं की रचना हुई है वहीं दूसरी ओर उर्दू की रूबाइयों और गज़लों का प्रभाव भी कविता पर पड़ा है। अंग्रेजी के सॉनेट से मिलती-जुलती कविता भी इन कवियों ने लिखी। यह छंदहीन कविता मुक्तक छंद को अपनाती है।
भारत भूषण अग्रवाल की कविता का एक उदाहरण,जिसमें काव्य गद्यात्मक हो गया है:-
तुम अमीर थी
इसलिए हमारी शादी न हो सकी
पर मान लो,तुम गरीब होती--
तो भी क्या फर्क पड़ता
क्योंकि तब
मैं अमीर होता

अज्ञेय की एक कविता का अंश जिसमें लोक-गीत के आधार पर सरल काव्य रचना की गई है-
मेरा जिया हरसा
जो पिया,पानी बरसा
खड़-खड़ कर उठे पात
फड़क उठे गात 

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रत्येक क्षेत्र में नवीनता का आग्रह प्रयोगवाद की उपलब्धि है। इसी के चलते कहीं-कहीं यह कविता दुरुह भी हो गई है। इसके लिए डॉ. नगेन्द्र ने पांच कारणों को प्रमुख माना-1. भावतत्त्व और काव्यानुभूति के मध्य रागात्मक के स्थान पर बुद्धिगत संबंध 2. साधारणीकरण का त्याग 3. उपचेतन मन के खंड अनुभवों का यथावत चित्रण 4. भाषा का एकांत एवं अनर्गल प्रयोग तथा 5. नूतनता का सर्वग्राही मोह।
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रविवार, 22 जनवरी 2012

प्रयोगवाद

प्रयोग शब्द का सामान्य अर्थ है, 'नई दिशा में अन्वेषण का प्रयास'। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रयोग निरंतर चलते रहते हैं। काव्य के क्षेत्र में भी पूर्ववर्ती युग की प्रतिक्रिया स्वरूप या नवीन युग-सापेक्ष चेतना की अभिव्यक्ति हेतु प्रयोग होते रहे हैं। सभी जागरूक कवियों में रूढ़ियों को तोड़कर या सृजित पथ को छोड़ कर नवीन पगडंडियों पर चलने की प्रवृत्ति न्यूनाधिक मात्रा में दिखाई पड़ती है। चाहे यह पगडंडी राजपथ का रूप ग्रहण न कर सके। सन् 1943 या इससे भी पांच-छ: वर्ष पूर्व हिंदी कविता में प्रयोगवादी कही जाने वाली कविता की पग-ध्वनि सुनाई देने लगी थी। कुछ लोगों का मानना है कि 1939 में नरोत्तम नागर के संपादकत्व में निकलने वाली पत्रिका 'उच्छृंखल' में इस प्रकार की कविताएं छपने लगी थी जिसमें 'अस्वीकार','आत्यंतिक विच्छेद' और व्यापक 'मूर्ति-भंजन' का स्वर मुखर था तो कुछ लोग निराला की 'नये पत्ते', 'बेला'  और 'कुकुरमुत्ता' में इस नवीन काव्य-धारा के लक्षण देखते हैं। लेकिन 1943 में अज्ञेय के संपादन में 'तार-सप्तक' के प्रकाशन से प्रयोगवादी कविता का आकार स्पष्ट होने लगा और दूसरे तार-सप्तक के प्रकाशन वर्ष 1951 तक यह स्पष्ट हो गया। 

प्रयोगवाद का जन्म 'छायावाद' और 'प्रगतिवाद' की रुढ़ियों की प्रतिक्रिया में हुआ। डॉ. नगेन्द्र प्रयोगवाद के उत्थान के विषय में लिखते हैं,-"भाव क्षेत्र में छायावाद की अतिन्द्रियता और वायवी सौंदर्य चेतना के विरुद्ध एक वस्तुगत,मूर्त और ऐन्द्रिय चेतना का विकास हुआ और सौंदर्य की परिधि में केवल मसृण और मधुर के अतिरिक्त परुष,अनगढ़,भदेश का समावेश हुआ।" छायावादी कविता में वैयक्तिकता तो थी,किंतु उस वैयक्तिकता में उदात्त भावना थी। इसके विपरीत्त प्रगतिवाद में यथार्थ का चित्रण तो था,किंतु उसका प्रतिपाद्य विषय पूर्णत: सामाजिक समस्याओं पर आधारित था और उसमें राजनीति की बू थी। अत: इन दोनों की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रयोगवाद का उद्भव हुआ, जो 'घोर अहंमवादी','वैयक्तिकता' एवं 'नग्न-यथार्थवाद' को लेकर चला।श्री लक्ष्मी कांत वर्मा के शब्दों में,"प्रथम तो छायावाद ने अपने शब्दाडम्बर में बहुत से शब्दों और बिम्बों के गतिशील तत्त्वों को नष्ट कर दिया था। दूसरे, प्रगतिवाद ने सामाजिकता के नाम पर  विभिन्न भाव-स्तरों एवं शब्द-संस्कार को अभिधात्मक बना दिया था।ऐसी स्थिति में नए भाव-बोध को व्यक्त करने के लिए न तो शब्दों में सामर्थ्य था और न परम्परा से मिली हुई शैली में। परिणामस्वरूप उन कवियों को  जो इनसे पृथक थे,सर्वथा नया स्वर और नये माध्यमों का प्रयोग करना पड़ा। ऐसा इसलिए और भी करना पड़ा,क्योंकि भाव-स्तर की नई अनुभूतियां विषय और संदर्भ में इन दोनों से सर्वथा भिन्न थी।

प्रयोगवाद नाम तारसप्तक में अज्ञेय के इस वक्तव्य से लिया गया-"प्रयोग सभी कालों के कवियों ने किए हैं। किंतु कवि क्रमश: अनुभव करता आया है कि जिन क्षेत्रों में प्रयोग हुए हैं, आगे बढ़कर अब उन क्षेत्रों का अन्वेषण करना चाहिए जिन्हें अभी छुआ नहीं गया था जिनको अभेद्य मान लिया गया है।"

इन अन्वेषणकर्ता कवियों में अज्ञेय ने तार सप्तक में ऐसे सात-सात कवियों को अपनाया "जो किसी एक स्कूल के नहीं हैं,किसी एक विचारधारा के नहीं हैं,किसी मंजिल पर पहुंचे हुए नहीं हैं,अभी राही हैं- राही नहीं,राहों के अन्वेषी।...काव्य के प्रति एक अन्वेषी का दृष्टिकोण उन्हें समानता के सूत्र में बांधता है।...उन में मतैक्य नहीं है,सभी महत्वपूर्ण विषय में उनकी अलग-अलग राय है- जीवन के विषय में,समाज और धर्म और राजनीति के विषय में,काव्य-वस्तु और शैली के छंद और तुक में,कवि के दायित्वों के, प्रत्येक विषय में उनका आपस में मतभेद है। यहां तक कि हमारे जगत के ऐसे सर्वमान्य और स्वयं सिद्ध मौलिक सत्यों को भी वे स्वीकार नहीं करते, जैसे- लोकतंत्र की आवश्यकता,उद्योगों का समाजीकरण,यांत्रिक युद्ध की उपयोगिता,वनस्पति घी की बुराई अथवा काननबाला और सहगल के गानों की उत्कृष्टता इत्यादि। वे सब एक-दूसरे की रुचियों,कृतियों और आशाओं और विश्वासों पर एक-दूसरे की जीवन-परिपाटी पर और यहां तक कि एक-दूसरे के मित्रों और कुत्तों पर भी हंसते हैं।"

प्रयोगवादी कवियों का नए के प्रति यह आग्रह ही इन्हें प्रयोगवादी बनाता है। प्रयोगवाद के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए इस धारा के कवियों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं:-

अज्ञेय :प्रयोगशील कविता में नए सत्यों,नई यथार्थताओं का जीवित बोध भी है,उन सत्यों के साथ नए रागात्मक संबंध भी और उनको पाठक या सहृदय तक पहुंचाने यानी साधारणीकरण की शक्ति भी है।

डॉ. धर्मवीर भारती : प्रयोगवादी कविता में भावना है,किंतु हर भावना के आगे एक प्रश्न-चिह्न लगा है। इसी प्रश्न-चिह्न को आप बौद्धिकता कह सकते हैं। सांस्कृतिक ढ़ांचा चरमरा उठा है और यह प्रश्न चिह्न उसी की ध्वनि-मात्र है।

श्री गिरिजाकुमार माथुर: प्रयोगों का लक्ष्य है व्यापक सामाजिक सत्य के खंड अनुभवों का साधारणीकरण करने में कविता को नवानुकूल माध्यम देना,जिसमें व्यक्ति द्वारा इस व्यापक सत्य का सर्वबोधगम्य प्रेषण संभव हो सके।

प्रयोगवाद को आकार देने में जहां 'सप्तकों' की भूमिका रही वहीं अनेक पत्रिकाओं ने भी इसकी राह को सरल बनाया। तार-सप्तकों की संख्या चार है। पहला सप्तक 1943, दूसरा 1951, तीसरा 1959 और चौथा सप्तक 1979 में प्रकाशित हुआ। पत्रिकाओं में' प्रतीक', 'पाटल', 'दृष्टिकोण', 'कल्पना', 'अजंता', 'राष्ट्रवाणी', 'धर्मयुग', 'नई कविता', 'निकष', 'ज्ञानोदय', 'कृति', 'लहर', 'निष्ठा', 'शताब्दी', 'ज्योत्स्ना', 'आजकल', 'कल्पना आदि हैं।


प्रयोगवाद को प्रतीकों की प्रधानता और नवीन प्रतीकों को अपनाने के कारण 'प्रतीकवाद' नाम से भी अभिहित किया गया। प्रयोगवाद से कुछ लोगों का अभिप्राय 'रूपवाद' अथवा 'फार्मलिज्म' तक सीमित है। लेकिन रूपवाद प्रयोगवाद की शाखा-मात्र है। क्योंकि प्रयोगवादी केवल रूप-विधान या तकनीक पर ही ध्यान नहीं देते; उसमें अन्य तत्व भी मौजूद हैं।

प्रयोगवाद के भीतर ही 'प्रपद्यवाद' या 'नकेनवाद' भी पनपा लेकिन वह प्रयोगवाद की एक छोटी शाखा-मात्र बन कर रह गया। नकेनवाद बिहार में प्रचलित हुआ। 'नलिन विलोचन शर्मा','केसरीकुमार' और 'नरेश' नामों के प्रथम अक्षर से बना है नकेन। नकेनवादी तीनों कवियों ने 'प्रयोग-दशसूत्री' में प्रयोगवाद और प्रयोगशीलता में अंतर स्पष्ट किया है। ये प्रयोग को ही काव्य का एकमात्र लक्ष्य मानते हैं।

डॉ जगदीश चंद्र गुप्त  और श्री रामस्वरूप चतुर्वेदी ने 1954 में' नई कविता' नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन शुरु किया। इसने प्रयोगवादी कविता को नई कविता का नाम दिया। कुछ आलोचक नई कविता और प्रयोगवाद में कोई अंतर नहीं मानते जबकि कुछ का मानना है कि दोनों को एक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। हमारे दृष्टिकोण से नई कविता प्रयोगवाद का ही विकसित या स्थापित हुआ रूप है। प्रयोगवादी कविता जब काव्य जगत में स्वीकृत हो गई तो उसे नई कविता के नाम से अभिहित किया गया। जो लोग प्रयोगवाद और नई कविता को अलग-अलग रूप में देखते हैं वे दलगत राजनीति के शिकार हैं।


रविवार, 15 जनवरी 2012

प्रगतिवादी कवि और उनकी रचनाएं

प्रगतिवादी कवियों को हम तीन श्रेणियों में रख सकते हैं: एक,वे कवि जो मूल रूप से पूर्ववर्ती काव्यधारा छायावाद से संबद्ध हैं, दूसरे वे जो मूल रूप से प्रगतिवादी कवि हैं और तीसरे वे जिन्होंने प्रगतिवादी कविता से अपनी काव्य-यात्रा शुरु की लेकिन बाद में प्रयोगवादी या नई कविता करने लगे। पहले वर्ग के कवियों में सुमित्रानंदन पंत,सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'(विशुद्ध छायावादी),नरेन्द्र शर्मा,भगवती चरण वर्मा,रामेश्वर शुक्ल 'अंचल',बच्चन की कुछ कविताएं(हालावादी कवि),बालकृष्ण शर्मा 'नवीन',माखन लाल चतुर्वेदी,रामधारी सिंह 'दिनकर',उदयशंकर भट्ट,उपेन्द्रनाथ 'अश्क',जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिंद'(राष्ट्रीय काव्य धारा) आदि हैं। जिन्होंने प्रगतिवादी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान दिया। मूल रूप से प्रगतिवादी कवियों में केदारनाथ अग्रवाल,रामविलास शर्मा,नागार्जुन,रांगेय राघव,शिवमंगल सिंह 'सुमन',त्रिलोचन का नाम उल्लेखनीय है। गजानन माधव मुक्तिबोध,अज्ञेय,भारत भूषण अग्रवाल, भवानी प्रसाद मिश्र,नरेश मेहता, शमशेर बहादुर सिंह,धर्मवीर भारती में भी प्रगतिवाद किसी न किसी रूप में मौजूद है,पर इन्हें प्रयोगवादी कहना ही उचित होगा। 

यहां हम सभी प्रमुख प्रगतिवादी कवियों और उनकी प्रगतिवादी कृतियों का नामोल्लेख कर रहें हैं :-
  1. सुमित्रानंदन पंत(1900-1970) प्रगतिवादी रचनाएं: 1.युगांत 2.युगवाणी 3.ग्राम्या ।
  2. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (1897-1962) प्रगतिवादी रचनाएं : 1. कुकुरमुत्ता 2. अणिमा 3.नए पत्ते 4. बेला 5.अर्चना।
  3. नरेन्द्र शर्मा(1913-1989): 1. प्रवासी के गीत 2.पलाश-वन 3. मिट्टी और फूल 4. अग्निशस्य।
  4. रामेश्वर शुक्ल अंचल(1915 -1996): 1.किरण-वेला 2. लाल चुनर।
  5. माखन लाल चतुर्वेदी(1888- 1970): 1.मानव 
  6. रामधारी सिंह दिनकर(1908- 1974) : 1. कुरुक्षेत्र 2. रश्मिरथी 3.परशुराम की प्रतीक्षा।
  7. उदयशंकर भट्ट(1898- 1964): 1.अमृत और विष ।
  8. बालकृष्ण शर्मा नवीन(1897- 1960):1.कंकुम 2. अपलक 3.रश्मि-रेखा 4. क्वासि।
  9. जगन्नाथ प्रसाद मिलिंद(1907-1986):1. बलिपथ के गीत 2. भूमि की अनुभुति 3.पंखुरियां।
  10. केदारनाथ अग्रवाल(1911-2000 ) :1. युग की गंगा 2. लोक तथा आलोक 3. फूल नहीं रंग बोलते हैं 4.नींद के बादल।
  11. राम विलास शर्मा(1912- 2000) :1.रूप-तरंग 
  12. नागार्जुन(1910-1998) : 1.युगधारा 2.प्यासी पथराई 3.आंखे 4.सतरंगे पंखों वाली 5.तुमने कहा था 6. तालाब की मछलियां 7.हजार-हजार बांहों वाली 8.पुरानी जूतियों का कोरस 9. भस्मासुर(खंडकाव्य)।
  13. रांगेय-राघव(1923-1962) : 1.अजेय खंडहर 2.मेधावी 3. पांचाली 4. राह के दीपक 5.पिघलते पत्थर।
  14.  शिव-मंगल सिंह सुमन( 1915- 2002 ) : 1. हिल्लोल 2.जीवन के गान 3.प्रलय सृजन।
  15. त्रिलोचन(1917- 2007 ) :1.मिट्टी की बात 2. धरती 
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

प्रगतिवादी कविता की प्रवृत्तियां


समाज और समाज से जुड़ी समस्याओं यथा गरीबी,अकाल,स्वाधीनता,किसान-मजदूर,शोषक-शोषित संबंध और इनसे उत्पन्न विसंगतियों पर जितनी व्यापक संवेदनशीलता इस धारा की कविता में है,वह अन्यत्र नहीं मिलती। यह काव्यधारा अपना संबंध एक ओर जहां भारतीय परंपरा से जोड़ती है वहीं दूसरी ओर भावी समाज से भी। वर्तमान के प्रति वह आलोचनात्मक यथार्थवादी दृष्टि अपनाती है। प्रगतिवादी काव्यधारा की प्रमुख प्रवृत्तियां इस प्रकार हैं:- 

1. सामाजिक यथार्थवाद : इस काव्यधारा के कवियों ने समाज और उसकी समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया है। समाज में व्याप्त सामाजिक,आर्थिक,धार्मिक,राजनीतिक विषमता के कारण दीन-दरिद्र वर्ग के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि के प्रसारण को इस काव्यधारा के कवियों ने प्रमुख स्थान दिया और मजदूर,कच्चे घर,मटमैले बच्चों को अपने काव्य का विषय चुना। 
सड़े घूर की गोबर की बदबू से दबकर

महक जिंदगी के गुलाब की मर जाती है  
               ...केदारनाथ अग्रवाल
 *****
ओ मजदूर! ओ मजदूर!!

तू सब चीजों का कर्त्ता,तू हीं सब चीजों से दूर

ओ मजदूर! ओ मजदूर!!
 *****
श्वानों को मिलता वस्त्र दूध,भूखे बालक अकुलाते हैं।

मां की हड्डी से चिपक ठिठुर,जाड़ों की रात बिताते हैं
***** 
युवती की लज्जा बसन बेच,जब ब्याज चुकाये जाते हैं

मालिक जब तेल फुलेलों पर पानी सा द्रव्य बहाते है

पापी महलों का अहंकार देता मुझको तब आमंत्रण        ---दिनकर

2.  मानवतावाद का प्रकाशन : वह मानवता की अपरिमित शक्ति में विश्वास प्रकट करता है और ईश्वर के प्रति अनास्था प्रकट करता है;धर्म उसके लिए अफीम का नशा है -
जिसे तुम कहते हो भगवान-
जो बरसाता है जीवन में
रोग,शोक,दु:ख दैन्य अपार 
उसे सुनाने चले पुकार

3.क्रांति का आह्वाहन: प्रगतिवादी कवि समाज में क्रांति की ऐसी आग भड़काना चाहता है,जिसमें मानवता के विकास में बाधक समस्त रूढ़ियां जलकर भस्म हो जाएं-
देखो मुट्ठी भर दानों को,तड़प रही कृषकों की काया।

कब से सुप्त पड़े खेतों से,देखो 'इन्कलाब' घिर आया॥
*****
कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ

जिससे उथल पुथल मच जाए


4. शोषकों के प्रति आक्रोश: प्रगतिवाद दलित एवं शोषित समाज के 'खटमलों'-पूंजीवादी सेठों,साहूकारों और राजा-महाराजाओं–के शोषण के चित्र उपस्थित कर उनकी मानवता का पर्दाफाश करता है-
ओ मदहोश बुरा फल हो,शूरों के शोणित पीने का।

देना होगा तुझे एक दिन,गिन-गिन मोल पसीने का॥

5.शोषितों को प्रेरणा : प्रगतिवादी कवि शोषित समाज को स्वावलम्बी बनाकर अपना उद्धार करने की प्रेरणा देता है-
न हाथ एक अस्त्र हो, न साथ एक शस्त्र हो।               

न अन्न नीर वस्त्र हो, हटो नहीं, डटो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो। 
वह शोषित में शक्ति देखता है और उसे क्रांति में पूरा विश्वास है। इस प्रकार प्रगतिवादी कवि को शोषित की संगठित शक्ति और अच्छे भविष्य पर आस्था है-
मैंने उसको जब-जब देखा- लोहा देखा
लोहा जैसा तपते देखा,गलते देखा,ढ़लते देखा
मैंने उसको गोली जैसे चलते देखा 
                                                 ...केदारनाथ अग्रवाल

6. रूढ़ियों का विरोध- इस धारा के कवि बुद्धिवाद का हथौड़ा लेकर सामाजिक कुरीतियों पर तीखे प्रहार कर उनको चकनाचूर कर देना चाहते हैं-
गा कोकिल!बरसा पावक कण
नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन    ...पंत
7. तत्कालीन समस्याओं का चित्रण : प्रगति का उपासक कवि अपने समय की  समस्याओं जैसे-बंगाल का अकाल आदि की  ओर आंखें खोलकर देखता है और उनका यथार्थ रूप उपस्थित कर समाज को जागृत करना चाहता है-
बाप बेटा बेचता है
भूख से बेहाल होकर,    
धर्म धीरज प्राण खोकर
हो रही अनरीति,राष्ट्र सारा देखता है
एक भिक्षुक की यथार्थ स्थिति –
वह आता

दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता   ...निराला
 
8.मार्क्सवाद का समर्थन: इस धारा के कुछ कवियों ने मात्र साम्यवाद के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स का तथा उसके सिद्धांतों का समर्थन करने हेतु प्रचारात्मक काव्य ही लिखा है-
साम्यवाद के साथ स्वर्ण-युग करता मधुर पदार्पण
 और साथ ही साम्यवादी देशों का गुणगान भी किया है-

लाल रूस का दुश्मन साथी! दुश्मन सब इंसानों का

9.नया सौंदर्य बोध: प्रगतिवादी कवि श्रम में सौंदर्य देखते हैं। उनका सौंदर्य-बोध सामाजिक मूल्यों और नैतिकता से रहित नहीं है। वे अलंकृत या असहज में नहीं,      सहज सामान्य जीवन और स्थितियों में सौंदर्य देखते हैं। खेत में काम करती हुई किसान नारी का यह चित्र इसी तरह का है-
बीच-बीच में सहसा उठकर खड़ी हुई वह युवती सुंदर

लगा रही थी पानी झुककर सीधी करे कमर वह पल भर

इधर-उधर वह पेड़ हटाती,रुकती जल की धार बहाती

10. व्यंग्य : सामाजिक,आर्थिक वैषम्य का चित्रण करने से रचना में व्यंग्य आ जाना स्वाभाविक है। व्यंग्य ऊपर-ऊपर हास्य लगता है किंतु वह अंतत: करुणा उत्पन्न करता है। इसीलिए सामाजिक व्यंग्य अमानवीय-शोषण सत्ता का सदैव विरोध करता है। प्रगतिशील कवियों में व्यंग्य तो सबके यहां मिल जाएगा किंतु नागार्जुन इस क्षेत्र में सबसे आगे हैं। एक देहाती मास्टर दुखरन, उसके शिष्यों और मदरसे की यह तस्वीर नागार्जुन ने इस प्रकार खींची है-
घुन खाए शहतीरों पर की बारह खड़ी विधाता बांचे

फटी भीत है,छत है चूती,आले पर बिस्तुइया नाचे

लगा-लगा बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पांच तमाचे

इसी तरह से दुखरन मास्टर गढ़ता है आदम से सांचे।

11. प्रकृति : मानव समाज की भांति प्रकृति के क्षेत्र में भी प्रगतिवादी कवि सहज स्थितियों में सौंदर्य देखता है। उसका सौंदर्य बोध चयनवादी नहीं। प्रगतिवादी कवियों ने प्रकृति और ग्राम जीवन के अनुपम चित्र खींचे हैं जिनमें रूप-रस-गंध-वर्ण के बिम्ब उभरे हैं।नागार्जुन का 'बादल को घिरते देखा है',केदारनाथ अग्रवाल का 'बसंती हवा' और त्रिलोचन का 'धूप में जग-रूप सुंदर' उत्कृष्ट कविताएं हैं।

12.प्रेम – प्रगतिवादी कवियों ने प्रेम को सामाजिक-पारिवारिक रूप में देखा है। वर्ग-विभक्त समाज में प्रेम सहज नहीं हो पाता। प्रेम वर्ग-भेद,                            ,वर्ण-भेद को मिटाता है। प्रगतिवादी कवि प्रेम की पीड़ा का एकांतिक चित्र करते हैं। किंतु वह वास्तविक जीवन संदर्भों में होता है।अत: उनका एकांत भी समाजोन्मुख होता है; जैसे त्रिलोचन का यह अकेलापन- 
आज मैं अकेला हूं,अकेले रहा नहीं जाता

जीवन मिला है यह,रतन मिला है यह

फूल में मिला है या धूल में मिला है यह

मोल-तोल इसका अकेले कहा नहीं जाता

आज मैं अकेला हूं

13. नारी-चित्रण :प्रगतिवादी कवि के लिए मजदूर तथा किसान के समान नारी भी शोषित है,जो युग-युग से सामंतवाद की कारा में पुरुष की दासता की लौहमयी जंजीरों से जकड़ी है। स्वतंत्र व्यक्तित्व खो चुकी है और केवल मात्र रह गई है पुरुष की वासना तृप्ति का उपकरण। इसलिए वह उसकी मुक्ति चाहता है-अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व खो चुकी है और केवल मात्र रह गई है पुरुष की वासना तृप्ति का उपकरण। इसलिए वह उसकी मुक्ति चाहता है-
योनि नहीं है रे नारी! वह भी मानवी प्रतिष्ठित

उसे पूर्ण स्वाधीन करो,  वह रहे न नर पर अवसित
अधिकांश प्रगतिवादियों का नारी-प्रेम उच्छृंखल और स्वछंद है-
मैं अर्थ बताता द्रोहभरे यौवन का

मैं वासना नग्न को गाता उच्छृंखल

प्रगतिवादी कवि ने नारी के सुकोमल सौंदर्य की उपेक्षा करके उसके स्थुल शारीरिक सौंदर्य को ही अधिक उकेरा है। उसने नारी की कल्पना कृषक बालाओं व मजदूरनियों में की है।

14.साधारण कला पक्ष :प्रगतिवाद जनवादी है। अत: वह जन-भाषा का प्रयोग करता है। उसे ध्येय को व्यक्त करने की चिंता है। काव्य को अलंकृत करने की चिंता नहीं। अत: वह कहता है-
तुम वहन कर सको जन-जन में मेरते विचार।

वाणी!मेरी चाहिए क्या तुम्हें अलंकार॥

छंदों में भी अपने स्वछंद दृष्टिकोण के अनुसार उन्होंने मुक्तक छंद का ही प्रयोग किया है-
खुल गए छंद के बंध,प्रास के रजत पाश           ....पंत

प्रगतिवादी कविता में नए उपमानों को लिया गया है और वे सामान्य जन जीवन और लोक-गीतों से ग्रहण किए गए हैं-
कोयल की खान की मजदूरिनी सी रात।  

बोझ ढ़ोती तिमिर का विश्रांत सी अवदात॥
मशाल,जोंक,रक्त,तांडव,विप्लव,प्रलय आदि ,  आदि नए प्रतीक प्रगतिवादी साहित्य की अपनी सृष्टि हैं। प्रगतिवादी कवि का कला संबंधी दृष्टिकोण भाषा,छंद,अलंकार,प्रतीकों तथा वर्णित भावों से स्पष्ट हो जाता है। वह कला को स्वांत: सुखाय या कला कला के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए,बहुजन के लिए अपनाता है। वह कविता को जन-जीवन का प्रतिनिधि मानता है।

नई कविता की प्रवृत्तियां

प्रयोगवाद और नई कविता की प्रवृत्तियों में कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई देता। नई कविता प्रयोगवाद की नींव पर ही खड़ी है। फिर भी कथ्य की व्यापकत...