छायावाद की प्रवृत्तियां

छायावादी काव्य का विश्लेषण करने पर हम उसमें निम्नांकित प्रवृत्तियां पाते हैं :-

1. वैयक्तिकता : छायावादी काव्य में वैयक्तिकता का प्राधान्य है। कविता वैयक्तिक चिंतन और अनुभूति की परिधि में सीमित होने के कारण अंतर्मुखी हो गई, कवि के अहम् भाव में निबद्ध हो गई। कवियों ने काव्य में अपने सुख-दु:ख,उतार-चढ़ाव,आशा-निराशा की अभिव्यक्ति खुल कर की। उसने समग्र वस्तुजगत को अपनी भावनाओं में रंग कर देखा। जयशंकर प्रसाद का'आंसू' तथा सुमित्रा नंदन पंत के 'उच्छवास' और 'आंसू' व्यक्तिवादी अभिव्यक्ति के सुंदर निदर्शन हैं। इसके व्यक्तिवाद के स्व में सर्व सन्निहित है।डॉ. शिवदान सिंह चौहान इस संबंध में अत्यंत मार्मिक शब्दों में लिखते हैं -''कवि का मैं प्रत्येक प्रबुद्ध भारतवासी का मैं था,इस कारण कवि ने विषयगत दृष्टि से अपनी सूक्ष्मातिसूक्ष्म अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए जो लाक्षणिक भाषा और अप्रस्तुत रचना शैली अपनाई,उसके संकेत और प्रतीक हर व्यक्ति के लिए सहज प्रेषणीय बन सके।''छायावादी कवियों की भावनाएं यदि उनके विशिष्ट वैयक्तिक दु:खों के रोने-धोने तक ही सीमित रहती,उनके भाव यदि केवल आत्मकेंद्रित ही होते तो उनमें इतनी व्यापक प्रेषणीयता कदापि न आ पाती। निराला ने लिखा है-
              मैंने मैं शैली अपनाई,
              देखा एक दु:खी निज भाई
              दुख की छाया पड़ी हृदय में
              झट उमड़ वेदना आई 

इससे स्पष्ट है कि व्यक्तिगत सुख-दु:ख की अपेक्षा अपने से अन्य के सुख-दुख की अनूभूति ने ही नए         कवियों के भाव-प्रवण और कल्पनाशील हृदयों को स्वच्छंदतावाद की ओर प्रवृत्त किया।

2. प्रकृति-सौंदर्य और प्रेम की व्यंजना : छायावादी कवि का मन प्रकृति चित्रण में खूब रमा है और प्रकृति के सौंदर्य और प्रेम की व्यंजना छायावादी कविता की एक प्रमुख विशेषता रही है। छायावादी कवियों ने प्रकृति को काव्य में सजीव बना दिया है। प्रकृति सौंदर्य और प्रेम की अत्यधिक व्यंजना के कारण ही डॉ. देवराज ने छायावादी काव्य को 'प्रकृति-काव्य' कहा है। छायावादी काव्य में प्रकृति-सौंदर्य के अनेक चित्रण मिलते हैं; जैसे 1. आलम्बन रूप में प्रकृति चित्रण 2.उद्दीपन रूप में प्रकृति चित्रण 3.प्रकृति का मानवीकरण 4.नारी रूप में प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन 5.आलंकारिक चित्रण 6.प्रकृति का वातावरण और पृष्ठभूमि के रूप में चित्रण 7. रहस्यात्मक अभिव्यक्ति के साधन के रूप में चित्रण।
प्रसाद,पंत,निराला,महादेवी आदि छायावाद के सभी प्रमुख कवियों ने प्रकृति का नारी रूप में चित्रण किया और सौंदर्य व प्रेम की अभिव्यक्ति की। पंत की कविता का एक उदाहरण देखिए-

बांसों का झुरमुट
संध्या का झुटपुट
हैं चहक रहीं चिड़ियां
टी वी टी टुट् टुट् 

छायावादी कवि के लिए प्रकृति की प्रत्येक छवि विस्मयोत्पादक बन जाती है। वह प्राकृतिक सौंदर्य पर विमुग्ध होकर रहस्यात्मकता की ओर उन्मुख हो जाता है- 

मैं भूल गया सीमाएं जिससे
वह छवि मिल गई मुझे 

छायावादी कवि ने निजी अनुभूतियों का व्यक्तिकरण प्रकृति के माध्यम से किया है; जैसे- 
मैं नीर भरी दुख की बदली 

छायावादी कवि सौंदर्यानुभूति से अभिभूत है। अपने आंतरिक सौंदर्य का उद्घाटन प्रकृति के माध्यम से करता हुआ दिखाई पड़ता है-
शशि मुख पर घूंघट डाले,अंचल में दीप छिपाए
जीवन की गोधूलि में,कौतूहल से तुम आए                 ...प्रसाद 

अधिकांश छायावादी कवियों ने प्रकृति के कोमल रूप का चित्रण किया है,परंतु कहीं-कहीं उसके उग्र रूप का चित्रण भी हुआ है। 

3.शृंगारिकता :छायावादी काव्य में शृंगार-भावना की प्रधानता है,परंतु यह शृंगार रीतिकालीन स्थूल एवं ऐन्द्रिय शृंगार से भिन्न है।छायावादी शृंगार-भावना मानसिक एवं अतीन्द्रिय है। यह शृंगार-भावना दो रूपों में अभिव्यक्त हुई है- 1. नारी के अतीन्द्रिय सौंदर्य चित्रण द्वारा 2. प्रकृति पर नारी-भावना के आरोप के माध्यम से। पंत और प्रसाद ने अछूती कल्पनाओं की तूलिका से नारी के सौंदर्य का चित्रण किया है। एक उदाहरण देखिए- 
तुम्हारे छूने में था प्राण
संग में पावन गंगा स्नान
तुम्हारी वाणी में कल्याणी
त्रिवेणी की लहरों का गान 

नारी का अतीन्द्रिय सौंदर्य चित्रण प्रसाद जी द्वारा श्रद्धा के सौंदर्य में द्रष्टव्य है- 
नील परिधान बीच सुकुमार,
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।
खिला हो ज्यों बिजली का फूल,
मेघवन बीच गुलाबी रंग। 

निराला की 'जुही की कली' कविता में दूसरे प्रकार की शृंगार-भावना का चित्र है। प्रसाद ने'कामायनी' में सौंदर्य को चेतना का उज्ज्वल वरदान माना है। इस प्रकार छायावादी शृंगार-भावना और उसके सभी उपकरणों(नारी,सौंदर्य,प्रेम) का चित्रण सूक्ष्म एवं उदात्त है। उसमें वासना की गंध बहुत कम है। 

छायवादी कवि को प्रेम के क्षेत्र में जाति,वर्ण,सामाजिक रीति-नीति,रुढ़ियां और मिथ्या मान्यताएं मान्य नहीं हैं; निराला जी लिखते हैं - 

दोनों हम भिन्न वर्ण, भिन्न जाति, भिन्न रूप।
भिन्न धर्म भाव, पर केवल अपनाव से प्राणों से एक थे॥

इनके प्रेम चित्रण में कोई लुकाव-छिपाव-दुराव नहीं है। उसमें कवि की वैयक्तिकता है। इनकी प्रणय गाथा का अंत प्राय: दु:ख,निराशा तथा असफलता में होता है। अत: उसमें मिलन की अनुभूतियों की अपेक्षा विरहानुभूतियों का चित्रण अधिक हुआ है और इस दिशा में उन्हें आशातीत सफलता भी मिली; पंत के शब्दों में
-
शून्य जीवन के अकेले पृष्ठ पर
विरह अहह कराहते इस शब्द को 
किसी कुलिश की तीक्ष्ण चुभती नोंक से
निठुर विधि ने आंसुओं से है लिखा 

4. रहस्यानुभूति :छायावादी कवि को अज्ञात सत्ता के प्रति एक विशेष आकर्षण रहा है। वह प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ में इसी सत्ता के दर्शन करता है। उसका इस अंनत के प्रति प्रमुख रूप से विस्मय तथा जिज्ञासा का भाव है। लेकिन उनका रहस्य जिज्ञासामूलक है, उसे कबीर और दादू के रहस्यवाद के समक्ष खड़ा नहीं किया जा सकता।निराला तत्व ज्ञान के कारण, तो पंत प्राकृतिक सौंदर्य से रहस्योन्मुख हुए। प्रेम और वेदना ने महादेवी को रहस्योन्मुख किया तो प्रसाद ने उस परमसत्ता को अपने बाहर देखा। यद्यपि महादेवी में अवश्य ही रहस्य-साधना की दृढ़ता दिखाई पड़ती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में,''कवि उस अनंत अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से अभिव्यंजना करते हैं। ...तथा छायावाद का एक अर्थ रहस्यवाद भी है। अत: सुधी आलोचक रहस्यवाद को छायावाद का प्राण मानते हैं ।''छायावादी कवियों की कुछ रहस्य अनुभूतियों के उदाहरण देखिए- 

हे अनंत रमणीय कौन तुम!
यह मैं कैसे कह सकता!
कैसे हो,क्या हो इसका तो
भार विचार न सह सकता? - प्रसाद 

प्रिय चिरन्तन है सजनि
क्षण-क्षण नवीन सुहागिनी मैं
तुम मुझ में फिर परिचय क्या!       --महादेवी 
प्रथम रश्मि का आना रंगिणि
तुने कैसे पहचाना?                       -- पंत 
किस अनंत का नीला अंचल हिला-हिलाकर आती तुम सजी मंडलाकर         -- निराला
तृणवीरुध लहलहे हो किसके रस से सिंचे हुए                           --प्रसाद 
तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूं उस ओर क्या है                 -- महादेवी

5.तत्त्व चिंतन : छायावादी कविता में अद्वैत-दर्शन,योग-दर्शन,विशिष्टाद्वैत-दर्शन,आनंदवाद आदि के अंतर्गत दार्शनिक चिंतन भी मिलता है। प्रसाद का मूल दर्शन आनंदवाद है तो महादेवी ने अद्वैत,सांख्य एवं योग दर्शन का विवेचन अपने ढ़ग से किया है।

6. वेदना और करुणा की विवृत्ति : छायावादी कविता में वेदना की अभिव्यक्ति करुणा और निराशा के रूप में हुई है। हर्ष-शोक,हास-रुदन, जन्म-मरण,विरह-मिलन आदि से उत्पन्न विषमताओं से घिरे हुए मानव-जीवन को देखकर कवि हृदय में वेदना और करुणा उमड़ पड़ती है।जीवन में मानव-मन की आकांक्षाओं और अभिलाषाओं की असफलता पर कवि-हृदय क्रन्दन करने लगता है। छायावादी कवि सौंदर्य प्रेमी होता है,किंतु सौंदर्य की क्षणभंगुरता को देख उसका हृदय आकुल हो उठता है। हृदयगत भावों की अभिव्यक्ति की अपूर्णता,अभिलाषाओं की विफलता,सौंदर्य की नश्वरता, प्रेयसी की निष्ठुरता, मानवीय दुर्बलताओं के प्रति संवेदनशीलता और प्रकृति की रहस्यमयता आदि अनेक कारणों से छायावादी कवि के काव्य में वेदना और करुणा की अधिकता पाई जाती है। प्रसाद ने "आंसू" में वेदना को साकार रूप दिया है। पंत तो काव्य की उत्त्पत्ति ही वेदना को मानते हैं -

वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान।
उमड़ कर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अजान॥

महादेवी तो पीड़ा में ही अपने प्रिय को ढ़ूंढ़ती हैं -
तुमको पीड़ा में ढ़ूंढ़ा, तुममें ढ़ूंढ़ूंगी पीड़ा।

और पंत जी कहते हैं -
चिर पूर्ण नहीं कुछ जीवन में
अस्थिर है रूप जगत का मद ।  

संसार में दुख और वेदना को देखकर छायावादी कवि पलायनवादी भी हुआ। वह इस संसार से ऊब चुका है और कहीं ओर चला जाना चाहता है। इसका मुख्य कारण यह है कि वह इस संसार में दुख ही दुख देखता है, यहां सर्वत्र सुख का अभाव दृष्टिगोचर होता है। इस विषय में कवि पंत की अभिव्यक्ति द्रष्टव्य है:-

यहां सुख सरसों,शोक सुमेरु
अरे जग है जग का कंकाल
वृथा रे,यह अरण्य चीत्कार
शांति,सुख है उस पार

निराला भी जग के उस पार जाना चाहते हैं। प्रसाद भी अत्यंत प्रसिद्ध गीत में नाविक से इस कोलाहलपूर्ण संसार से दूर चलने का अनुरोध करते हैं।

7. मानवतावादी दृष्टिकोण : छायावादी काव्य भारतीय सर्वात्मवाद तथा अद्वैतवाद से गहरे रूप से प्रभावित हुआ। इस काव्य पर रामकृष्ण परमहंस,विवेकानंद,गांधी,टैगोर तथा अरविंद के दर्शन का भी काफी प्रभाव रहा।स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति के कारण छायावादी कवि को साहित्य के समान धर्म,दर्शन आदि में भी रुढ़ियों एवं मिथ्या परम्पराएं मान्य नहीं हैं। रविंद्रनाथ ठाकुर,जो बंगला साहित्य में मानवतावाद का उद्घोष पहले ही कर चुके थे, का प्रभाव छायावादी कवियों पर भी रहा।छायावादी कवि सारे संसार से प्रेम करता है। उसके लिए भारतीय और अभारतीय में कोई भेद नहीं क्योंकि सर्वत्र एक ही आत्मा व्याप्त है। विश्वमानवता की प्रतिष्ठा उसका आदर्श है।

8.नारी के प्रति नवीन दृष्टिकोण : नारी के प्रति छायावाद ने सर्वथा नवीन दृष्टिकोण अपनाया है। यहां नारी वासना की पूर्ति का साधन नहीं है,यहां तो वह प्रेयसी,जीवन-सहचरी,मां आदि विविध रूपों में उतरी है। उसका मुख्य रूप प्रेयसी का ही रहा है। यह प्रेयसी पार्थिव जगत की स्थूल नारी नहीं है,वरन कल्पना लोक की सुकुमारी देवी है। नारी के संबंध में प्रसाद जी कहते हैं-

नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास-रजत-नग-पगतल में
पीयूष-स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में

छायावादी कवि ने युग-युग से उपेक्षित नारी को सदियों की कारा से मुक्त करने का स्वर अलापा। छायावादी कवि कह उठता है - "मुक्त करो नारी को,युग-युग की कारा से बंदिनी नारी को।"

निसंदेह छायावाद ने नारी को मानवीय सहृदयता के साथ अंकित किया है। पंत की प्रसिद्ध पंक्ति है -"देवि मां सहचरि प्राण!!!" प्रसाद ने नारी को आदर्श श्रद्धा के रूप में देखा जो रागात्मक वृत्ति की प्रतीक है और मनुष्य को मंगल एवं श्रेय के पथ पर ले जाने वाली है। निराला नारी की यथार्थ स्थिति को काफी पहचान कर उसे चित्रित करते हैं। उन्होंने विधवा को इष्ट देव के मंदिर की पूजा कहा। इलाहाबाद के पथ पर तोड़ती हुई मजदूरनी का चित्र खिंचा, तुलसी की पत्नी रत्नावली का चित्रण रीतिकालीन नारी विषयक धारणा को तोड़नेवाली के रूप में किया।

9. आदर्शवाद : छायावाद में आंतरिकता की प्रवृत्ति की प्रधानता है। उसमें चीजों के बाह्य स्थूल रूप चित्रण की प्रवृत्ति नहीं है। अपनी इस अंतर्मुखी प्रवृत्ति के कारण उनका दृष्टिकोण काव्य के भावजगत और शैली में आदर्शवादी रहा। उसे स्थूलता के चित्रण की बजाय अपनी अनुभूतियां अधिक यथार्थ लगी हैं। यही कारण है कि उसका काव्य संबंधी दृष्टिकोण कल्पनात्मक रहा और उसमें सुंदर तत्त्व की प्रधानता बनी रही। छायावादी कवि के इस आदर्शवादी, कल्पनात्मक दृष्टिकोण को उसके कला पक्ष में भी सहज ही देखा जा सकता है।

10.स्वच्छंदतावाद : छायावादी कवि ने अहंवादी होने के कारण विषय,भाव,कला,धर्म,दर्शन और समाज के सभी क्षेत्रों में स्वछंदतावादी प्रवृत्ति को अपनाया। उसे अपने हृदयोदगार को अभिव्यक्त करने के लिए किसी प्रकार का शास्त्रीय बंधन और रुढ़ियां स्वीकार नहीं हैं। भाव-क्षेत्र में भी उसने इसी क्रांति का प्रदर्शन किया। उसमें 'मैं' की शैली अपनाई, हालांकि उसके 'मैं' में समूचा समाज सन्निहित है। अब छायावादी कवि के लिए प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक दिशा का मार्ग उन्मुक्त था। छायावादी कवि के लिए कोई भी वस्तु काव्य-विषय बनने के लिए उपयुक्त थी। इसी स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति के फलस्वरूप छायावादी काव्य में सौंदर्य और प्रेम चित्रण, प्रकृति-चित्रण,राष्ट्रप्रेम,रहस्यात्मकता,वेदना और करुणा, वैयक्तिक सुख-दु:ख, अतीत प्रेम, कलावाद,प्रतीकात्मकता और लाक्षणिकता,अभिव्यंजना आदि सभी प्रवृत्तियां मिलती है। उसे पुरानी पिटी-पिटाई राहों पर चलना अभिप्रेत नहीं है।संक्षेप में कह सकते हैं कि छायावाद वैयक्तिक रुचि-स्वातंत्र्य का युग है।

11.देश-प्रेम एवं राष्ट्रीय भावना : राष्ट्रीय जागरण की क्रोड़ में पलने-पनपने वाला स्वच्छंदतावादी छायावाद साहित्य यदि रहस्यात्मकता और राष्ट्र प्रेम की भावनाओं को साथ-साथ लेकर चला है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। सच तो यह है कि राष्ट्रीय जागरण ने छायावाद के व्यक्तिवाद को असामाजिक पथों पर भटकने से बचा लिया। छायावादी कवि में आंतरिकता की कितनी भी प्रधानता क्यों न हो वह अपने युग से निश्चित रूप से प्रभावित हुआ। यही कारण है कि जयशंकर प्रसाद पुकार उठते हैं -

अरुण यह मधुमय देश हमारा ...

या

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती

माखन लाल चतुर्वेदी कह उठते हैं -
मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर तुम देना फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।

12.प्रतीकात्मकता :प्रतीकात्मकता छायावादियों के काव्य की कला पक्ष की प्रमुख विशेषता है। प्रकृति पर सर्वत्र मानवीय भावनाओं का आरोप किया गया और उसका संवेदनात्मक रूप में चित्रण किया गया,इससे यह स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तित्व से विहीन हो गई और उसमें प्रतीकात्मकता का व्यवहार किया गया। उदाहरणार्थ, फूल सुख के अर्थ में,शूल दुख के अर्थ में,उषा प्रफुल्लता के अर्थ में,संध्या उदासी के अर्थ में,झंझा-झकोर गर्जन मानसिक द्वन्द्व के अर्थ में,नीरद माला नाना भावनाओं के अर्थ में प्रयुक्त हुए।दार्शनिक अनुभूतियों की अभिव्यंजना एवं प्रेम की सूक्ष्मातिसूक्ष्म दशाओं के अंकन में भी इस प्रतीकात्मकता को देखा जा सकता है।

13.चित्रात्मक भाषा एवं लाक्षणिक पदावली : अन्य अनुपम विशिष्टताओं के अतिरिक्त केवल चित्रात्मक भाषा के कारण हिंदी वाङ्मय में छायावादी काव्य को स्वतंत्र काव्य धारा माना जा सकता है।कविता के लिए चित्रात्मक भाषा की अपेक्षा की जाती है और इसी गुण के कारण उसमें बिम्बग्राहिता आती है। छायावादी कवि इस कला में परम विदग्ध हैं।"छायावादी काव्य में प्रसाद ने यदि प्रकृति तत्त्व को मिलाया, निराला ने उसे मुक्तक छंद दिया,पंत ने शब्दों को खराद पर चढ़ाकर सुड़ौल और सरस बनाया तो महादेवी ने उसमें प्राण डाले,उसकी भावात्मकता को समृद्ध किया।"प्रसाद की निम्नांकित पंक्तियों में भाषा की चित्रात्मकता की छटा देखते ही बनती है;-

शशि मुख पर घूंघट डाले,अंचल में दीप छिपाए।
जीवन की गोधूलि में,कौतूहल से तुम आए।

छायावादी कवि ने सीधी सादी भाव संबंधित भाषा से लेकर लाक्षणिक और अप्रस्तुत-विधानों से युक्त चित्रमयी भाषा तक का प्रयोग किया और कदाचित इस क्षेत्र में उसने सर्वाधिक मौलिकता का प्रदर्शन किया।छायावादी कवि ने परम्परा-प्राप्त उपमानों से संतुष्ट न होकर नवीन उपमानों की उद्भावना की। इसमें अप्रस्तुत-विधान और अभिव्यंजना-शैली में शतश: नवीन प्रयोग किए। मूर्त में अमूर्त का विधान उसकी कला का विशेष अंग बना। निराला जी विधवा का चित्रण करते हुए लिखते हैं- "वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा सी"। यही कारण है कि छायावादी काव्यधारा के पर्याप्त विरुद्ध लिखने वाले आलोचक रामचंद्र शुक्ल को भी लिखना पड़ गया कि  "छायावाद की शाखा के भितर धीरे-धीरे काव्य शैली का बहुत अच्छा विकास हुआ,इसमें संदेह नहीं।"इसमें भावावेश की आकुल व्यंजना, लाक्षणिक वैचित्र्य,मूर्त-प्रत्यक्षीकरण,भाषा की वक्रता,विरोध चमत्कार,कोमल पद विन्यास इत्यादि काव्य का स्वरूप संगठित करने वाली प्रचुर सामग्री दिखाई पड़ी। उन्होंने पंत काव्य के कुछ उदाहरण भी उपन्यस्त किए -"धूल की ढ़ेरी में अनजान। छिपे हैं मेरे मधुमय गान।मर्म पीड़ा के हास। कौन तुम अतुल अरूप अनाम।"

14. गेयता : छायावादी कवि केवल साहित्यिक ही नहीं वरन संगीत का भी कुशल ज्ञाता है। छायावाद का काव्य छंद और संगीत दोनों दृष्टियों से उच्च कोटि का है। इसमें प्राचीन छंदों के प्रयोग के साथ-साथ नवीन छंदों का भी निर्माण किया गया। इसमें मुक्तक छंद और अतुकांत कविताएं भी लिखी गई। छायावादी कवि प्रणय,यौवन और सौंदर्य का कवि है। गीति-शैली उसके गृहीत विषय के लिए उपयुक्त थी। गीति-काव्य के सभी गुण-संक्षिप्तता,तीव्रता,आत्माभिव्यंजना,भाषा की मसृणता आदि उपलब्ध होते हैं।गीति-काव्य के लिए सौंदर्य-वृत्ति और स्वानुभूति के गुणों का होना आवश्यक है, सौभाग्य से सारी बातें छायावादी कवियों में मिलती हैं।दूसरी एक और बात भी है कि आधुनिक युग गीति-काव्य के लिए जितना उपयुक्त है उतना प्रबंध-काव्यों के लिए नहीं। छायावादी साहित्य में, प्रगीत,खंड काव्य और प्रबंध काव्य भी लिखे गए और वीर गीति,संबोध गीति, शोकगीति,व्यंग्य गीति आदि काव्य के अन्य रूप विधानों का प्रयोग किया गया। छायावादी कवियों की भाषा और छंद केवल बुद्धिविलास,वचन भंगिमा,कौशल या कौतुक वृत्ति से प्रेरित नहीं रहा बल्कि उनकी कविता में भाषा भावों का अनुसरण करती दीखती है और अभिव्यंजना अनुभूति का।

15. अलंकार-विधान : अलंकार योजना में प्राचीन अलंकारों के अतिरिक्त अंग्रेजी साहित्य के दो नवीन अलंकारों-मानवीकरण तथा विशेषणविपर्यय का भी अच्छा उपयोग किया गया है।प्राकृतिक घटनाओं प्रात:,संध्या,झंझा,बादल और प्राकृतिक चीजों सूर्य,चंद्रमा आदि पर जहां मानवीय भावनाओं का आरोप किया गया है वहां मानवीकरण है। विशेषण विपर्यय में विशेषण का जो स्थान अभिधावृत्ति के अनुसार निश्चित है,उसे हटाकर लक्षणा द्वारा दूसरी जगह आरोप किया जाता है।पंत ने बच्चों के तुतले भय का प्रयोग उनकी तुतली बोली में व्यंजित भय के लिए किया है। इसी प्रकार" तुम्हारी आंखों का बचपन खेलता जब अल्हड़ खेल।" छायावादी कवि ने अमूर्त को मूर्त और मूर्त को अमूर्त रूप में चित्रित करने के लिए अनेक नवीन उपमानों की उद्भावना की है; जैसे - "कीर्ति किरण सी नाच रही है " तथा "बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल।" इसके अतिरिक्त उपमा,रूपक,उल्लेख,संदेह,विरोधाभास,रूपकातिशयोक्ति तथा व्यतिरेक आदि अलंकारों का भी सुंदर प्रयोग किया गया है।

16. कला कला के लिए :- स्वातन्त्र्य तथा आत्माभिव्यक्ति के अधिकार की भावना के परिणामस्वरूप छायावादी काव्य में "कला कला के लिए" के सिद्धांत का अनुपालन रहा है। वस्तु-चयन तथा उसके प्रदर्शन कार्य में कवि ने पूर्ण स्वतंत्रता से काम लिया है। उसे समाज तथा उसकी नैतिकता की तनिक भी चिंता नहीं है। यही कारण है कि उसके काव्य में 'सत्' और 'शिव' की अपेक्षा 'सुंदर' की प्रधानता रही है। छायावादी काव्य इस "कला कला के लिए" के सिद्धांत में पलायन और प्रगति दोनों सन्निहित हैं। एक ओर अंतर्मुखी प्रवृत्ति के कारण जहां जन-जीवन से कुछ उदासीनता है तो दूसरी ओर काव्य और समाज में मिथ्या रूढ़ियों के प्रति सबल विद्रोह भी। अत: छायावाद पर केवल पलायनवाद का दोष लगाना न्याय संगत नहीं होगा।

अंतत: डॉ. नगेन्द्र ने इस साहित्य की समृद्धि की समता भक्ति साहित्य से की है। "इस तथ्य से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि भाषा,भावना एवं अभिव्यक्ति-शिल्प की समृद्धि की दृष्टि से छायावादी काव्य अजोड़ है। विशुद्ध अनुभूतिपरक कवित्वमयता की दृष्टि से भी इसकी तुलना अन्य किसी युग के साहित्य से नहीं की जा सकती।इस दृष्टि से भक्ति काल के बाद आधुनिक काल का यह तृतीय चरण हिंदी साहित्य के इतिहास का दूसरा स्वर्ण-युग कहकर रेखांकित किया जा सकता है।इस कविता का गौरव अक्षय है,उसकी समृद्धि की समता केवल भक्ति काव्य ही कर सकता है।"      






टिप्पणियाँ

  1. उदाहरण के साथ आपने विस्तार से विषय पर प्रकाश डाला है।
    बहुत अच्छा आलेख।

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  2. छायावाद पर आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी । .मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  3. अति सुन्दर व क्रमबद्ध जानकारी मिली अनुपम

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  4. निश्चय ही सराहनीय कार्य, अनोकोनेक धन्यवाद।।

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