रहस्यवाद

द्विवेदी युग के अनंतर हिंदी कविता में एक ओर छायावाद का विकास हुआ वहीं दूसरी ओर रहस्यवाद और हालावाद का प्रादुर्भाव हुआ। वस्तुत: रहस्यवाद, बल्कि कहना चाहिए आधुनिक रहस्यवाद छायावादी काव्य-चेतना का ही विकास है। प्रकृति के माध्यम से मात्र सौंदर्य-बोध तक सीमित रहने वाली और साथ ही प्रकृति के माध्यम से प्रत्यक्ष जीवन का चित्रण करने वाली धारा छायावाद कहलाई; पर जहां प्रकृति के प्रति औत्सुक्य एवं रहस्यमयता का भाव भी जाग्रत हो गया वहां यह रहस्यवाद में परिवर्तित हो गई।जहां वैयक्तिकता का भाव प्रबल हो गया,वहां यह धारा हालावाद के रूप में सर्वथा अलग हो गई।

छायावाद और रहस्यवाद का मुख्य अंतर यह है कि छायावाद में प्रकृति पर मानव जीवन का आरोप है और यह प्रकृति प्रेम तक ही सीमित रहता है,किंतु रहस्यवाद में प्रकृति के माध्यम से उस अज्ञात-अनंत शक्ति के साथ संबंध स्थापित करने का प्रयत्न होता है,जो सहज ही प्राप्य नहीं है। इस तथ्य को दूसरे शब्दों में य़ों भी कह सकते हैं कि "छायावाद में प्रकृति अथवा परमात्मा के प्रति कुतूहल रहता है, पर जब यह कुतूहल आसक्ति का रूप धारण कर लेता है,तब वहां से रहस्यवाद की सीमा प्रारंभ हो जाती है।"

आत्मा-परमात्मा के संबंध में चर्चा दर्शनशास्त्र का विषय है। किंतु दर्शन में विचारों की,चिंतन की प्रधानता रहती है। रहस्यवाद भावना की वस्तु है-काव्य का विषय है।इसी सत्य की ओर संकेत करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था कि"साधना के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है, वही साहित्य-क्षेत्र में रहस्यवाद है।"

रहस्यवादी कवि शरीर की सुध-बुध भूलकर अंतर्जगत में रम जाता है, आत्मारूप में। 'आत्मा' शब्द का प्रयोग युगों से स्त्रीलिंग में हो रहा है। अत: रहस्यवादी कवि की'आत्मा' स्त्रीलिंग में बोलती है। परमात्मा पुलिंग है। धीरे-धीरे परमात्मा और आत्मा नर-नारी के रूप बन जाते हैं और यही दशा विकसित होती हुई आत्मा और परमात्मा में दाम्पत्य भाव की स्थापना कर देती है। यही कारण है कि रहस्यवादी भावनाएं अधिकतर दाम्पत्य प्रेम के रूप में अभिव्यक्त होती हैं। 

रहस्य का अर्थ है -"ऐसा तत्त्व जिसे जानने का प्रयास करके भी अभी तक निश्चित रूप से कोई जान नहीं सका। ऐसा तत्त्व है परमात्मा। काव्य में उस परमात्म-तत्त्व को जानने की, जानकर पाने की और मिलने पर उसी में मिलकर खो जाने की प्रवृत्ति का नाम है-रहस्यवाद।" 

रहस्यवाद का इतिहास
रहस्यवाद भारतीय काव्य के लिए कोई नई चीज नहीं है।वेदों और उपनिषदों में(ऋग्वेद का नारदीय सूक्त,केनोपनिषद्,श्वेताश्वेतरोपनिषद आदि),गीता के 11वें अध्याय में, शंकराचार्य के अद्वैतवाद में,सहजानंद के उपासक कण्हपा आदि सिद्धों की रचनाओं में रहस्यवादी भावनाएं नाना रूपों में व्यक्त हुई हैं; किंतु वेदों से सिद्धों तक यह अभिव्यक्ति बौद्धिक चिंतन अर्थात मस्तिष्क से ही संबंधित रही हैं।अत: इसे रहस्यवाद नहीं,दर्शन कहना उचित है। 

हिंदी में रहस्यवाद का स्वर सर्वप्रथम कबीर की वाणी में सुनाई देता है।कबीर एक पहुंचे हुए संत थे। उनकी अनुभुति में आत्मा-परमात्मा की एकता का सुंदर चित्रण हुआ। वे कहते हैं- 
"जल में कुंभ,कुंभ में जल है,बाहर भीतर पानी।
फूटा कुंभ, जल जलहिं समाना, यह तत कथ्यो गियानी॥"
उसी युग में जायसी ने भी रहस्यवादी भावना का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया है। उनकी अनुभूति में  प्रेम की पीर और विरह-वेदना का प्राधान्य है। 

भक्तिकाल के अनंतर रहस्यवादी भावना हिंदी काव्य से लुप्तप्राय: रही। किंतु आधुनिक युग में छायावादी युग के प्रारंभ होने के साथ ही रहस्यवाद का स्वर भी मुखरित हो उठा। इस युग के सभी प्रमुख कवियों की कविता में रहस्यवाद की भावना व्यक्त हुई। लेकिन यह आधुनिक रहस्यवाद प्राचीन रहस्यवाद अथवा यथार्थ रहस्यवाद से भिन्न है। यथार्थ रहस्यवाद से तात्पर्य ऐसे साधकों से है जिन का जीवन ही रहस्य-साधना द्वारा परम तत्त्व की अनुभूति एवं उसके साथ तादात्म्य करने में ही लीन हो गया। उन्होंने वैयक्तिक साधक होते हुए भी समष्टिगत तत्त्वों को भी उसी में पाने की कोशिश की। हिंदी में कबीर,नानक,दादू,रैदास आदि इसी प्रकार के रहस्य साधक हैं। उनकी रहस्य साधना में वैयक्तिक मोक्ष की कामना के साथ-साथ सामाजिक मोक्ष की मंगल कामना भी अंतर्निहित है। इसके विपरीत्त आधुनिक छायावादियों में जिस रहस्यमयता के दर्शन होते हैं,वहां कल्पना की ही प्रधानता है। निराला एवं महादेवी में हमें कुछ सीमा तक पहली जैसी भावना की अनुभूति अवश्य होती है,किंतु अन्य आधुनिक रहस्यवादियों का चेतनागत परिवर्तित रूप उन्हें रहस्य साधक रहने ही नहीं देता। फिर भी वहां तथाकथित काल्पनिक रहस्यवाद तो है ही। 

आधुनिक रहस्यवाद पश्चिमी धारा से प्रभावित है। प्राचीन रहस्यवाद में बौद्धिक चेतना की प्रधानता है,किंतु आधुनिक रहस्यवाद में प्रेम-संबंध तथा प्रणय निवेदन को प्रमुख स्थान दिया गया है। प्राचीन रहस्यवाद में धार्मिक अनुभूति एवं साधना का प्राधान्य है,किंतु आधुनिक रहस्यवाद धार्मिक साधना का फल न होकर मुख्यत: कल्पना पर आधारित है।

हिंदी में आधुनिक रहस्यवाद पश्चिम की देन है। इस बात को प्रसाद ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया है। वे इसे भारतीय परंपरा का विकसित रूप मानते हैं। "वर्तमान हिंदी में इस अद्वैत रहस्यवाद की सौंदर्यमय व्यंजना होने लगी है। वह साहित्य में रहस्यवाद का स्वाभाविक विकास है....वर्तमान रहस्यवाद की धारा भारत की निजी संपत्ति है,इसमें संदेह नहीं।" एक अन्य जगह पर उन्होंने लिखा है- "आज साहित्य में विश्व- सुंदरी प्रकृति में चेतना का आरोप संस्कृत वाङ्गमय में प्रचुरता से प्राप्त होता है। यह प्रकृति या शक्ति का रहस्यवाद सौंदर्य-लहरी के 'शरीरत्वं शम्भो' का अनुकरण मात्र है। वर्तमान हिंदी का रहस्यवाद स्वाभाविक रूप से विकसित हो कर आया है।" महादेवी वर्मा ने भी रहस्यवाद के तत्त्वों का उल्लेख करते हुए उसे परम्परागत ही माना है। वे लिखती हैं- "आज गीत में हम जिसे नए रहस्यवाद के रूप में ग्रहण कर रहे हैं, वह इन सबकी विशेषताओं से युक्त होने पर भी उन सबसे भिन्न है। उसने परा-विद्या की अपार्थिवता ली,वेदांत के अद्वैत की छाया ग्रहण की,लेकिन प्रेम से तीव्रता उधार ली और इन सबको कबीर के सांकेतिक दाम्पत्य-भाव सूत्र में बांधकर एक निराले स्नेह संबंध की सृष्टि कर डाली, जो मनुष्य के हृदय को आलंबन दे सका, उसे पार्थिव प्रेम से ऊपर उठा सका तथा मस्तिष्क को हृदयमय और हृदय को मस्तिष्कमय बना सका।"

यदि निष्पक्ष हो कर देखा जाए तो मानना पड़ेगा कि भले ही छायावाद युग के कवियों का रहस्यवाद परम्परा से विकसित हो; किंतु इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि छायावादियों को रहस्यवाद की ओर प्रेरित करने का श्रेय विलियम वर्डसवर्थ, कॉलरिज,ब्लेक,शैली,कीट्स जैसे पाश्चात्य रोमान्टिक कवियों की कृतियों का ही है। जब छायावाद के कवियों ने इन पाश्चात्य कवियों की कृतियों में रहस्यवाद की अभिव्यक्ति देखी तो ये भी उसकी ओर प्रवृत्त हुए और अपनी रचनाओं में उसे स्वीकार किया। निश्चित ही आधुनिक छायावादियों का रहस्यवाद साधनात्मक नहीं बल्कि कल्पनात्मक है। 

टिप्पणियाँ

  1. रहस्यवाद पर इतना बढिया आलेख मैंने नहीं पढ़ा पहले। काफ़ी कुछ सीखने को मिला आपकी पोस्ट से।

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  2. यह मेरे लिए परम सौभाग्य. की बात है कि आपने रहस्यवाद पर मेरी मुँह की बात को छीन लिया है । मैं शीघ्र ही रहस्यवाद पर एक पोस्ट प्रस्तुत करने के लिए तैयारी कर चुका हू । मेर पोस्ट के बाद मैं आपके पोस्ट पर प्रतिक्रिया दूँगा । उस समय तक
    I keep my right reserved . Thanks .

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  3. आपने मेरी जानकारी को व्यवस्थित किया है और वैज्ञानिक रूप से इस पूरे विषय को रेखांकित किया है! छायावाद को अंग्रेज़ी में रोमांटिसिज्म कहते हैं... मगर छायावाद के कवियों ने प्रकृति प्रेम के विषय में ही कवितायें रची हैं.. आज आपके इस आलेख के माध्यम से मुझे मेरे विचारों को परिभाषा और संदेह को समाधान प्राप्त हुआ है..
    रहस्यवाद का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि वह एक धुंए की तरह है जिसका न कोई रंग होता है, न कोई अस्तित्व.. लेकिन वो दिखता है और जितना दिखता है उससे अधिक छिपाता है.. छिपाना आकर्षण को जन्म देता है सदा से ही.. बस यही आकर्षण प्रेम बनाकर सूफियों और संतों के मुख से गीतों के रूप में प्रस्फुटित होता रहा है.. सुनने वाला समझता है कि महबूब और माशूक की बातें हैं, लेकिन पहुँचती है आत्मा और परमात्मा तक.. और यह दर्शन मिला आपकी इन पंक्तियों से:
    रहस्यवादी कवि शरीर की सुध-बुध भूलकर अंतर्जगत में रम जाता है, आत्मारूप में। 'आत्मा' शब्द का प्रयोग युगों से स्त्रीलिंग में हो रहा है। अत: रहस्यवादी कवि की'आत्मा' स्त्रिलिंग में बोलती है। परमात्मा पुलिंग है। धीरे-धीरे परमात्मा नर-नारी के रूप बन जाते हैं और यही दशा विकसित होती हुई आत्मा और परमात्मा में दाम्पत्य भाव की स्थापना कर देती है।
    आभार आपका!!

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  4. इतनी सही जानकारी रहस्यबाद पे ...अदभूत यह आलेख अपने आप में ...
    मेरे ब्लॉग पे आपका स्वागत है ..

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  5. मेरे ब्लॉग पर आने का धन्यवाद !
    रहस्यवाद का बढ़िया विश्लेषण किया है
    पढ़कर अच्छा लगा आभार !

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  6. analysis बहुत अच्छा है | धन्यवाद | भाषा भी समय के साथ रूप बदलती रहती है | रहस्यवाद का एक अनोखा आकर्षण है |

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  7. मानव बन जोगी कर रहा तलाश गली-गली,
    बनाकर मन्दिर मस्जिद और शिवालय ढुड रहा एक शिव को,
    एक-एक करके अनेक शिवों मे ढुड रहा एक शिव को,
    कहा मिलेगे कैसे मिलेगा क्यु मिलेगा यह मालुम नही किसी को,
    बोल-बोलकर थक गया जयदेव सभी को, नही सुनने वाला नही कोई लहने वाला,
    खुद ही नाम रखे खुद सज्ञां दे रहा मानव, फिर खुद ही अपने को भी भुल गया मानव,
    भुल गया मानव भुल गया शिव की सुरत भुल गया वो मुरत,
    बस मन मे ये मान लिया अब शिव नही है आ सकता क्योकि कलयुग है चल रहा,
    हम पापी है हमको नही मिलेगा अब महादेव,
    बस कर सकते उसकी पुजा-वन्दना और जप-तप और वैराग,
    धिरे-धिरे भुल गया जप-तप और वैराग लगा पुजने पत्थर मानकर भगवान,
    नही किसी को रहा यकिन पत्थर मे भी हो सकते है भगवान,
    बस यही यकिन कैसे तु करेगा ये फैसला तु ही करता है इंसान,
    इसी फैसले को तेरे बदलने लेकर मुरत का आवरण लेकर आता है भगवान,
    एक-एक कर कहता है सब कोई-कोई सुनता है इंसान,
    सुनकर भी कुछ नही मथं पाते मुरख इंसान,
    क्योकि मानव ने मान लिया अब कलयुग है, मानव रूप मे अब नही आ सकते भगवान,
    धरम गुरूओ ने चला दई कलयुग की चाल,
    संभल ले मानव कलयुग की भी अन्त वैला चली आई है,
    फिर क्यु मान रहा कलयुग की, मारेगा तुझको भी जाते-जाते ये कलयुग,
    अब तो रूककर सुन घोर अधेंरा जिस और तु जा रहा,
    रूककर सुन ले मत भाग अ मानव,
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  8. कलयुग ने जब पहला पग धरा धरती पर धुरी दुरी हो गई,
    दुरी फिर दिश हो गई,
    दिश घुम रही मुरत मे,
    मुरत घुम रही सुरत मे,
    सुरत घुम रही शिशे के दिल मे,
    शिशे के दिल मे एक वक़्त देखकर सो गई,
    आखँ खुली जब चारो ओर सुरत हो गई,
    सब को देखा सा लगता है,
    सब कुछ सुना सा लगता है,
    पर नही समझ अब आता है,
    कैसै खुद को माफ करू कैसे खुद को समझाऊ,
    जो दिखे जो सुनता है वही यहाँ सब हो रहा है,
    सुरत-सुरत मिलकर सुरॅती से सुरॅती मे खोई पङी है,
    सुरॅती मे बह रहा मुरती का जल,
    मुरती जल मे जीव घुम रहा,
    जीव खोए गया मुरती जल की लहरो मे,
    मुरती जल की लहरो मे जब-जब दुरी अवरूध हुई,
    तब-तब जीव भी अनुरूध होता है !!
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  9. हर आवाज मे एक ग़ुंज है हर लय मे एक ताल है,
    हर सास मे एक जीवन है हर चाहत मे एक नफरत है,
    हर ज़िंदगी मे एक मौत है हर शब्द मे एक शब्द है,
    हर शब्द मे एक विचार है हर विचार मे एक ख्याल है,
    हर ख्याल मे एक ख्वाब् है हर ख्वाब मे एक सच और एक झुठ है,
    हर सच का एक झुठ है हर झुठ का एक सच है,
    हर जीव का एक जीवन है हर जीवन का एक अन्त है,
    हर अन्त का भी एक अन्त है पैदा होना जीवन की शुरूआत है या अन्त की शुरूआत है,
    ना देख़े तो ज़ीवन क़ी शुरूआत है देख़े तो अन्त की शुरूआत है,
    जानकर भी अंजान है देख़े तो क़्या देखे हर किसी से पहचान है,
    वक़्त वो सय्य् है पत्ता-पत्ता जिसका गुलाम है,
    जानते है जीवन नही है फिर भी जीवन के गुलाम है,
    हर जीवन का अन्त है फिर भी न जाने क़्या गुमान है,
    भीङ मे खुद को देख कर सबको अपना बना बैठा है,
    भुल गया हर किसी से अनजान है,
    फिर भी ये कैसा गुमान सोचता है हर सय् उसकी गुलाम है !!
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  10. गंध रूपी सागर पाने को जल रहा, विरह ज्वाला मे मृगा जीव रे,
    ना ही कोई दिखता है रे, ना ही कछु समझ आये रे,
    भागा-भागा फिर रहा रे जीवन यु ही गवाऐ रे,
    बचपन खो दिया गंध को महक समझ के मानुष रे,
    आई जवानी और भरमाया गंध को महक समझकर गोते खाई रे,
    उठी विरह ज्वाला जब गंध की, फिरे डोलता पागल की तॉहि रे,
    नही मिली वो अरश से फरश तक फिर भी फिरे ढोलता उसके पिछे मानुष रे,
    गंध की विरह ज्वाला जला रही पल-पल, जब लग ढोलता रहा मन के आकाश मे,
    छाया रहा अधेंरा आँखो के सामने, एक तरफ दिखे रे चन्दा दुजी और सुरज आकाश मे,
    थक हारकर जब वो बैठा, देखा पलभर आकाश मे,
    क्या दिन क्या रात कहु, होता एक ही दिन आकाश मे,
    पलभर के लिए सब ठहर गया, ठहर गया आकाश रे,
    नही गति थी नही थी ध्वनि, सब ठहर गया आकाश मे,
    पल मे ही आया सामने एक दुजा आकाश रे,
    खुदी ही बनकर आया अपना सरजनहार रे,
    गुँज उठा शखंनाद ठहरे हुये आकाश मे,
    बिखर गये विणा के रंग, हो गया जीव के जीवन का आगाज रे,
    बह चली धार बन जीवन का आधार रे,
    अब तक चली थी राह अकेली,
    चलते-चलते अपनी ही परछाई, कब हो गयी राही ज्ञात रहा नही मानुष रे,
    फिर राही के संग हो चली राह, पकङ उंगली राही की राह लेके चली रे,
    मिलाय दिया बाकी राही से, भुल गया फिर राह को राही रे,
    राही खो गया दुजे राही मे, भुल गया फिर मंजिल अपनी रे,
    भुल गया उस राह को मानुष रे, अब खङा-खङा पुछे ये सवाल रे,
    सभी से पुछे खुद से ना पुछे सवाल रे,
    पुछ खुद से तु सवाल मिल जाएगा हर जवाब रे,
    देख पलटकर दिख जाएगा तुझको तेरा मुकाम रे,
    ना सवाल रहेगा ना जवाब रहेगा रे,
    जो रहेगा वो तु खुद ही रह जाएगा !
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  11. जलती ज्योत तेरी बिन तेल बिन बाती,
    जागे दिन रैन और राती,
    आए नही जाए नही फिर भी हर जगह दरशाए,
    पल मे कर दे उजयारा ना समझ आए,
    हर मय के प्याले की हर बुंद मे तु है,
    जिन्दगी की आस मे तु है मौत के आगोश मे तु है,
    तु हर कण मे हर साँस मे तु,
    क्या लिखु तेरे लिए हर लिखे शब्द की स्याही मे तु,
    लिख तो दु मगर लिखा न जाए तु,
    जीवन के हर अहसास मे है तु,
    जिन्दगी को देखु तो मौत का अहसास है तु,
    मौत को देखु तो हर जगह जगमगाता उजयारा है तु,
    समझ तो लु मगर समझ ना आए,
    देख तो लु मगर देखा न जाए जान तो लु मगर जाना न जाए तु,
    क्या है कह तो दु मगर कहा न जाए,
    बस यही कहु तु नशा है जो चढाये ना चढे,
    चढे तो उतारा न जाए,
    दिखाई न दे तो दिखा भी दु समझ न आए तो समझा भी दु,
    पर क्या करू ऐ मुसाफिर तुमने तो कसम खाई है मर जाने की,
    हर रास्ता बन्द करके तु बैठा है और सोचता है दरवाजा ही नही है
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  12. पहला पन्ना या आखिरी पन्ना कहा से लिखु उस एक पल का सत्य समझ ही नही आता,
    क्या कुछ नही होकर चला गया उस एक पल मे,
    सब बिगङकर बन गया या यु कहो बनकर बिगङ गया उस एक पल मे,
    ना जाने कितना कुछ अपने अन्दर ही छुपा लिया उस एक पल ने,
    क्या कहु कैसै समझाऊ उस एक पल को,
    ना जाने कितने एक पल समा गये उस एक पल मे,
    क्या समझाऊ उस पल की कहानी क्या समझाऊ उस की दास्ता,
    जिसमे सब कुछ रूककर फिर शुरू हो गया,
    उस एक पल मे ना जाने कितने एक–एक पल के टुकङे होकर समा गये,
    फिर भी वो पल वही का वही रह गया,
    उस पल मे ना जाने कितने ही पल समाकर गुम हो गये,
    उस पल को खोजते-खोजते ना जाने कितने ही उस पल मे हमेशा के लिये गुम हो गये,
    कल भी छुपा था आज भी छुपा है,
    क्या है ऐसा उस पल के अंदर जिसमे न जाने कितने एक पल भी समाकर खो गए,
    अब तुम ही बतलाओ ए मानुष उस पल का कैसे तुम्हे राज समझाऊ,
    जिसमे एक-एक पल करके ना जाने कितने एक पल समा गए,
    मगर सवाल फिर भी वही का वही है,
    हम जानते उस एक-एक पल का आखिरी जवाब जहॉ तक है,
    उस एक पल को पकङ पाते है या जाते देख पाते है,
    नही ये जान पाते है क़्या हुआ उस आखिरी पल के बाद के पल मे,
    ना जाने कितने एक आखिरी पल खो गऐ उस आखिरी पल के बाद के पहले पल को तलाश करने मे,
    जँहा भी एक पल को खोज के देखा तो अगले पल के होने का अहसास दे गया,
    आखिरी एक पल जहॉ तक तलाश किया एक पल को, वो एक पल बढता ही चला गया,
    जहॉ तक भी उस पल मे उस एक पल की तलाश की, ना जाने कितना बडा लगा,
    मगर ना जाने कितने एक-एक पल आगे जाके देखा,
    उस पल के होने का एहसास तो मिला मगर वो पल फिर भी ना मिला,
    अब मानुष सोच रहा कैसे करू तलाश, उस एक पल के बाद के पल का रहस्य क्या है,
    उस एक पल के बाद का आश्चयॅ, वो पल ना मिले ना सही ये तो पता चले क्या है,
    उस एक आखिरी पल के बाद घटने वाले पहले पल का रहस्य,
    यही सोचकर दिया कदम बढाऐ, उस आखिरी पल मे फिर भी रहस्य का रहस्य ही रह गया,
    आखिरी पल भी मिल गया और उसके बाद का पहला पल भी मिल गया,
    मगर फिर तलाश अधुरी की अधुरी रह गयी,
    उस आखिरी एक पल और पहले एक पल के बीच वो पल फिर रह गया,
    कैसे करू तलाश कैसे देखु उस पल को जो दोनो के बीच आया तो सही मगर आकर चला गया,
    देखकर भी नही देखा वो पल आया भी और आकर चला भी गया,
    अगर ए मानुष तु मानता है ये सवाल है,
    तो दोनो के बीच ठहर जा, वही तुझे वो पल मिलेगा,
    जिसमे गति दिखाई देती है मगर होती नही,
    यही वो फैसले की घङी है जब तुझे उस पल मे फैसला करना है,
    जो दोनो के बीच तु खङा है यही सवाल है यही जवाब है, ना समझे वो अनाङी है,
    आखिरी पल मे फैसला कर ले रूककर बीच मे जाना है,
    फिर जो तु देखना चाहे वही पल पहला पल हो, ये फैसला तु बीच मे खङा होकर कर ले,
    जिस पल को तु चुन ले, वही तेरा पहला पल हो,
    इस घाटी मे उतरने को कितने है बेताब,
    मगर जान ले ए मानुष कितना आसान और कितना मुश्किल है,
    ये आखिरी पल और पहले पल के बीच पल का स्थान,
    उस पल पर पहुचने के वास्ते तुझे होना होगा दुर आखिरी और पहले पल से,
    दोनो की दुरी को बॉटना होगा, बॉटते ही दुरी दोनो के बीच की हो जाएगा तु दोनो के बीच,
    वही खङे होकर तुझे लेना है फैसला कौन सा हो तेरा अगला पहला पल,
    जान ले तु खङा नही होगा और खङा भी होगा, जब तु होगा खङा उन दोनो पल के बीच,
    होगा सभी एक-एक पल मे, मगर दोनो पलो को बॉट देना होगा तुझे बीचो-बीच,
    टुट जाएगा नाता तेरा सबसे कुछ पल कहो या वो एक पल जिसमे तु होगा सभी से दुर,
    वही जाकर लेना होगा अगले पहले पल कहा होना चाहता है तु,
    नही कर सकेगा जब तक तु ये सब करना है बैकार,
    नही कभी ये जान सकेगा दोनो एक पल के बीच का सच,
    और किसी भी तरह ना तु समझ पाएगा उस पल का सच,
    जो पहुचेगा वही जान पाएगा उस पल का सच,
    वो भी इतना ही वो एक आखिरी पल भी था और ये पहला पल भी है,
    फिर भी गुप्त रह जाएगा वो दोनो के बीच,
    छुट गया वो पल पकङ लो उसको,
    जिसे पकङकर पार उतर गये साधु सन्त और फकिर,
    मानुष देखता रह गया वो निकल गये बीचो-बीच बे रॅग !!
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  13. आओ मानव जीवो बतलाता हु बदल जाता ह युग केसे रे,
    और आता ह अंडकार के उंदकर से नवयुग रे,
    जिस जिस को मालुम ह वो वो वो जान लो रे,
    आ ग्या समय एक याद आने का क्या क्या तुमने याद किया,
    वो नही काम आना रे,
    एक ही सवाल ह उसका क्या क्या याद ह तुमको रे,
    बस यही तुम फंस जाई गा रे,
    अब तो कर याद से तु सवाल,
    वरना महायाद की एक याद मे तु भी गुम चला जायगा रे,
    हे मानव कह रहा हु सच मगर केसे तु समझैगा रे,
    ये तुज को ही मालुम होगा रे,
    हम तो इतना जाने यही भासा को बास कर तुम समझता ह रे,
    फिर किस का एन्तजार ह क्या ज्यादा बोलना सत्य का साक्षी ह रे,
    अगर नही तो मानव जान ले कारण कोई भी हो रे,
    मगर युग बदलने का कारण किसी एक मानव जीव के लिये नही होता रे,
    ना ही वो धरती के लिया मानव और धरती तो उस कारण मे ह रे,
    मगर एक मानव उस कारण को जान सकता ह रे,
    देहसमय रहने तक ये मानव मे ताकत ह रे,
    मगर मानव को उसी ताकत का गुमान ह रे,
    उसको जीवन भर गुलाम बना कर रखता ह रे,
    और देह छोड़ने के बाद उसी गुमान का नशा जब टूटता ह रे,
    तो फिर एक बार ना सोने की कसम ही लेता ह रे,
    और फिर आने के लिया रोता ह रे,
    मगर आता उसी योनि मे ह रे,
    जिस की याद उस याद मे बंद ह रे,
    समय ना बेकार कर सोच क्या याद करना ह तुजको रे,
    जो तु भूल गया कोन ह क्या तु जान गया रे,
    अगर नही तो मरना ह क्या रे,
    भाग जा के जान ले जब तक तुज को मालुम ह ये स्वासा ह रे,
    इनसे ही कर सवाल क्या तुम हो रे,
    होगी तो देगी जवाब बस तु जवाब याद करना छोड़ दे रे,
    सब को मालुम करना ह तो मालुम करना छोड़ दे रे,
    जो मालुम ना हो उस को मालुम कर दूसरों को समझाना छोड़ दे रे,
    जो कहते ह समझा आ गया वो सब से आगे मरता ह रे,
    जो मरता मानव जीव को देख कर डर कर भागता ह रे,
    वही सवाल तलाश करता ह और मिलता भी उसको ही ह रे,
    नही अब कोई जानन वाला
    नही अब कोई जानन वाला
    नही अब कोई जानन वाला
    नही अब कोई जानन वाला
    नही अब कोई जानन वाला
    नही अब कोई जानन वाला
    नही अब कोई जानन वाला
    नही अब कोई जानन वाला
    नही अब कोई जानन वाला

    क्या आप जाग गये हो मानव,
    अगर हा तो कैसे खुद को यकिन दिलाओगे रे,
    आप एक आंख से देख रहे है या दो आँखों से रे,

    कल्याण हो
    !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  14. साहित्य अकादमी के दिये गए काम के लिए मुझे रहस्यवाद की परिभाषा चाहिए थी। आपका धन्यवाद।

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