रहस्यवाद की अवस्थाएं

रहस्य की खोज में साधक अनेक अवस्थाओं से गुजरता है।प्राचीन रहस्यवादियों की साधनागत विभिन्न स्थितियों और अवस्थाओं के समान आधुनिक रहस्यवाद में भी उन विभिन्न स्थितियों और अवस्थाओं के दर्शन होते हैं। अधिकांश विद्वद जनों ने रहस्यवाद की कम से कम तीन अवस्थाएं स्वीकार की हैं: जिज्ञासा,खोज और मिलन। जिज्ञासा में साधक के मन में अज्ञात सत्ता के प्रति आकर्षण व उत्कंठा का भाव जागृत होता है। यह स्थिति न्यूनाधिक समस्त छायावादी कवियों के काव्य में पाई जाती है। दूसरी स्थिति में अज्ञात के प्रति आकर्षण एवं उत्कंठा तीव्र होने लगती है। साधक की आत्मा उस अज्ञात रहस्यमयी सत्ता को पाने के लिए व्याकुल हो उठती है। खोज का परिणाम होता है-मिलन। इस स्थिति में साधक की आत्मा अपने साध्य के साथ एकाकारता का अनुभव कर समस्त सुख-दुखों एवं साधना-पथ में आने वाली तमाम कठिनाइयों से ऊपर उठ कर एक चरम आनंद की उदात्त अनुभूति में डूब जाती है।तब अपने-पराए, मैं और मेरा,वह और उसका,तू और तेरा आदि का भेद-भाव शेष नहीं रह जाता।तब एक ही आत्मा सबमें दीखने लगती है।

यहां हम आधुनिक रहस्यवादी रचनाओं से कुछ उदाहरण उद्धृत कर रहे हैं। जिज्ञासा तत्व में हम साधक के प्रयास को और परमात्मा के अनिर्वचनीय रूप को देख के उसकी महीमा का गान सुन सकते हैं और खोज में साधक की विरह और वियोग की स्थिति को देखते हैं। विरह के बाद मिलन की अनुभूति और फिर परमात्मा से एकाकार की स्थिति है।

1. जिज्ञासा : जब साधक संसार की अज्ञेयता,अनंतता,विचित्रता,अव्यक्तता को देखता है,तो उसका हृदय विस्मय और कौतूहल से भर जाता है। ऐसी स्थिति में वह जानना चाहता है कि इस जीवन और जगत का निर्माता कौन है और वह इस ज्ञानेच्छा को नाना रूपों में अभिव्यक्त करता है; हरिकृष्ण प्रेमी के शब्दों में इस स्थिति को देखिए- 
नभ के पर्दे के पीछे, करता है कौन इशारे।
सहसा किसने,खोले हैं जीवन के बंधन सारे॥

2. परमात्मा की अनिर्वचनीयता और उसकी महीमा का गान : जिज्ञासा ही जिज्ञासा में रहस्य के कपाट कुछ-कुछ खुलने लगते हैं और आत्मा को परमात्मा की झलक मिलने लगती है। वह विस्मित और विमुग्ध सी स्वयं को उस विराट के सम्मुख बहुत क्षुद्र पाती है और उसे कहने के लिए शब्द घड़ती है; उसकी अनिर्वचनीयता को शब्दों में बांधने की कोशिश करती है- 
क्या पूजा क्या अर्चन रे? 
उस असीम का सुंदर मंदिर
मेरा लघुतम जीवन रे                             - महादेवी 

3. विरह व वियोग की स्थिति : असीम सौंदर्य की अनुभूति के अनंतर कवि की आत्मा उस प्रिय के विरह में तड़पने लगती है,क्योंकि "तौ लगि धीर, देखी नहिं पीड़ा" धीरज के बंधन टूटने लगते हैं, वियोग का असाध्य रोग लग जाता है- 
ठहरो बेसुध पीड़ा को, मेरी न कहीं छू लेना।
जब तक वे आ न जगावें,बस सोती रहने देना॥                   -महादेवी

4. मिलन की अनुभूति : धीरे-धीरे प्रेम विकसित होता है और प्रेम की डोर उस रहस्य-रूप प्रिय को खींच लाती है। प्रिय-प्रियतमा का मिलन होता है और दिल की शहनाई की गूंज में सुनाई पड़ता है- 
ये सब सफुलिंग है मेरी उस ज्वालामुखी जलन के
कुछ शेष चिन्ह हैं केवल,मेरे उस महामिलन के॥                     -प्रसाद

5. एकाकारता - यह मिलन महानंद के रूप में परिवर्तित हो जाता है, आत्मा आनंद रूप प्रिय में खोकर अनुभव करने लगती है- 
जल थल मारुत व्योम में, जो छाया सब ओर।
खोज खोजकर खो गई, मैं पागल प्रेम विभोर॥

टिप्पणियाँ

  1. आज की यह पोस्ट काव्य-शास्त्र की दृष्टि से न भी हो तो एक आध्यात्मिक सुख दे रही है मुझे... एक ऐसा अनुभव जिसे मैं व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ... मगर दिल से महसूस कर सकता हूँ... अमीर खुसरो की याद आ गयी.. और फिर कबीर!!
    मनोज भाई बहुत ही सुन्दर पोस्ट!!

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  2. आपके आलेख में साहित्य के साथ अध्यात्म का संगम बहुत रोचक बना देता है पोस्ट को।

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  3. बहुत ही सुन्दर, ज्ञानवर्धक और रोचक पोस्ट रहा! बेहतरीन प्रस्तुती!

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