छायावादी युग में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता का विकास

छायावादी युग(सन्1917 से 1936)एक ऐसा कालखंड है जिसमें कविता विविध विषयों के साथ अवतरित हुई।जिस प्रकार रीतिकाल में रीतिबद्ध शृंगार कविता के साथ-साथ वीर रस प्रधान काव्य-धारा का प्रवाह होता रहा,उसी प्रकार आधुनिक काल के इस चरण में राष्ट्रीय काव्यधारा छायावादी और वैयक्तिक कविता के समानांतर प्रवाहित रही। इसमें द्विवेदी युग के मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त,रामनरेश त्रिपाठी आदि कुछ कवि तो कार्यरत रहे ही अन्य अनेक सशक्त कवियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।इन कवियों में माखनलाल चतुर्वेदी,बालकृष्ण शर्मा 'नवीन',जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिन्द',सुभद्राकुमारी चौहान,सोहन लाल द्विवेदी,रामधारी सिंह 'दिनकर',उदयशंकर भट्ट,उपेन्द्रनाथ 'अश्क', आदि प्रमुख हैं। अन्य कवियों में गुरुभक्त सिंह 'भक्त',श्यामनारायण पांडेय,विद्यावती 'कोकिल',सुमित्राकुमारी सिन्हा,आरसी प्रसाद सिंह,गोपालशरण सिंह 'नेपाली',अनूप शर्मा,हरिकृष्ण प्रेमी,पद्मसिंह शर्मा 'कमलेश', बालकृष्ण राव, हंसकुमार तिवारी,रमानाथ अवस्थी आदि हैं।इन कवियों की रचनाओं में सांस्कृतिक चेतना का बहुत बड़ा हाथ रहा है और उनमें भाषा का परिष्कृत रूप मिलता है, जो आधुनिक काव्य की बहुमूल्य देन है। 

माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा' के उपनाम से लिखते रहे। उनकी रचनाओं में निष्कपट देश-प्रेम व्यक्त हुआ है।'फूल की चाह' इनकी बहुत ही प्रसिद्ध छोटी कविता है,जो राष्ट्रीयता के लिए आत्मबलिदान की अमिट तड़प भरी है।इस छोटी कविता को इनके समूचे व्यक्तित्व एवं कृतित्व का आदर्श भी कह सकते हैं।इनकी भाषा शैली अत्यधिक सरल किंतु ओजस्वी है।छंद-विधान आदि की दृष्टि से भी इनमें नव्यता के दर्शन होते हैं।

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' का संबंध असहयोग-आदोलन से रहने के कारण इनकी कविताओं में जीवन की असफलताओं और विफलताओं का घोर क्रंदन और विप्लव है। इनकी शृंगारपरक रचनाओं में एक सच्चे रोमांटिक कवि के दर्शन होते हैं।

जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिन्द' की गणना युगीन राष्ट्रीय प्रतिनिधि कवियों में की जाती है। इनकी कला का एकमात्र उद्देश्य नव-जागरण एवं नव-निर्माण ही है। इसी कारण इन्होंने दलितों,शोषितों,मजदूर-किसानों की स्थितियों का बड़ा ही मार्मिक अंकन अपनी कविताओं में किया है।कल्पना की उदात्तता,सूक्ष्मता,प्रेम,करुणा और नवनिर्माण की उत्सुकता एवं ओजस्विता आदि बातों से समन्वित इनकी कविता वास्तव में अत्यधिक प्रेरणादायक है।अपने अंतराल में एक समूचे युग की चेतना को समेटे हुए हैं। इनकी कविता में भावों के समान छंद-विधान में भी विविधता स्पष्ट देखी जा सकती है।

सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झांसी की रानी' कविता की पंक्ति 'खूब लड़ी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी', आज भी नसों को फड़का देती है। राष्ट्रीयता की प्रखर चेतना के साथ-साथ वात्सल्य एवं स्नेह का भाव भी इनके काव्य में अनेक जगह पर ध्वनित हुआ है।

सोहनलाल द्विवेदी जी ने इस विश्वास को लेकर काव्य-साधना के क्षेत्र में प्रवेश किया कि"उदात्त भावों को,सद्-विवेक,सद्-विचार,सद्-भावना को जगाना ही काव्यादर्श है। जो कला-कविता हममें अच्छे संस्कारों को जाग्रत न कर सके,समझना चाहिए कि वह अपने आदर्श से च्युत है।" अपने इस आदर्श के अनुसार ही द्विवेदी जी ने जन चेतना को राष्ट्रीयता के सुघड़ संदर्भों में अपने काव्यों में चित्रित एवं मुखरित किया है। इनके काव्य का स्वर जीवन के यथार्थ धरातल पर टिका होने पर भी अंततोगत्वा आदर्शवादी ही है।

रामधारी सिंह'दिनकर' के तीखे स्वरों को छायावाद अपने में आत्मसात न कर सका। इसलिए ये राष्ट्रधारा के कवियों में सर्वाधिक सबल व्यक्तित्व लेकर उभरे।उस युग की दीवारों को फांदकर इन्होंने अगले युग की प्रगतिवादी चेतनाओं को भी अपने विराट व्यक्तित्व से छाए रखा।आधुनिक काव्य की समस्त विधाओं पर इनका समान अधिकार रहा। उर्दू कवि इकबाल,बंगला कवींद्र रवीन्द्र,पाश्चात्य कवियों में से मिल्टन,किट्स और शैले आदि से दिनकर जी बहुत प्रभावित रहे। समूची राष्ट्रवादी काव्यधारा में जनता का आक्रोश,इच्छा-आकांक्षाएं,ऊर्जस्विता और भारतीय यौवन की उन्मद हुँकार यदि वास्तविकता के साथ कहीं रूपायित हुई है,तो यह केवल दिनकर की रचनाओं में ही संभव हो पाया है।

उदयशंकर भट्ट की रचनाओं में जीवन की गहन अनुभूति,दार्शनिकता,वेदना,विषमता आदि का चित्रण मिलता है। प्रारंभिक निराशा के बाद कवि को फिर मानव की आत्म-शक्ति में विश्वास होने लगा।जो अध्यात्मवाद पर अवलम्बित नहीं है,उसमें भट्ट जी को विश्वास नहीं।

उपेन्द्रनाथ 'अश्क' की कविता में निराशा का भाव अधिक है। शोक और वेदना का स्वर इनके काव्य में स्पष्टत: सुना जा सकता है। इनकी काव्य-चेतना में निश्छलता एवं आडम्बर शून्यता विशेष दर्शनीय है। सीधे-सादे ढ़ग एवं भाषा में यह अपनी बात कह देते हैं।

गुरुभक्त सिंह 'भक्त' की प्रसिद्ध रचना 'नूरजहां' है,जिसमें मानव-हृदय के अंतर्द्वन्द्व और प्रेम की पीड़ा का सुंदर चित्रण किया गया है। प्रकृति-वर्णन और मुहावरों के प्रयोग के लिए उनकी यह रचना अत्यंत प्रसिद्ध है। उनकी एक अन्य प्रसिद्ध रचना 'विक्रमादित्य' है।

श्यामनारायण पांडेय भी वीर-रस के राष्ट्रीय कवि हैं। 'हल्दीघाटी' उनकी प्रसिद्ध रचना है। जो एक महाकाव्य है। इसके अतिरिक्त इनके 'जोहर', 'जय हनुमान' आदि अन्य काव्य संग्रह हैं।

टिप्पणियाँ

  1. एक साथ आपने इतने सारे राष्ट्र-प्रेम की भावना के प्रतिनिधि कवियों की रचनाएं और उनका परिचय दे डाला कि उन सबकी स्मृति ह्रदय में पुनर्जीवित हो उठी..
    बहुत ही सार्थक पोस्ट!!

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  2. इस रचना से गुज़रते हुए लगा एक पूरे युग से गुज़र गए। बहुत अच्छी और ज्ञानवर्धक पोस्ट।

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  3. इस पोस्ट के लिए धन्यवाद । मरे नए पोस्ट :साहिर लुधियानवी" पर आपका इंतजार रहेगा ।

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  4. एक सम्पूर्ण काल-खंड से होकर गुज़रना अच्छा लगा
    काव्य का उद्देश्य मानव सद्विचार को जगाना ही होना चाहिए
    महादेवी जी के बारे में जानना अभी मन में ही है
    धन्यवाद स्वीकारें .

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