कृष्ण भक्ति साहित्य पर विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव

भक्ति काल की चौथी काव्य-धारा का नाम है : कृष्णभक्ति काव्य धारा । इस भक्ति धारा पर विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव है; ये संप्रदाय इस प्रकार हैं :-
  1. विष्णु संप्रदाय : इस संप्रदाय के प्रवर्तक विष्णु गोस्वामी हैं । इसे रुद्र संप्रदाय भी कहा जाता है । यह शुद्धाद्वैतवादी है ।
  2. निम्बार्क संप्रदाय : इस संप्रदाय के प्रवर्तक निम्बक आचार्य हैं । इसका प्रमुख ग्रंथ "वेदांत पारिजात सौरभ" है । यह दश श्लोकी द्वैताद्वैतवादी है । इस संप्रदाय में कृष्ण के वामांग में सुशोभित राधा के साथ कृष्ण की उपासना का विधान है ।
  3. माध्व-संप्रदाय : इसके प्रवर्तक माध्वाचार्य है । इसने द्वैतवाद को प्रश्रय दिया ।
  4. श्री संप्रदाय : इसके प्रवर्तक रामानुजाचार्य हैं । इनके ग्रंथ हैं : वेदांत संग्रह, श्री भाष्य, गीता भाष्य । विशिष्टाद्वैत की स्थापना इनके द्वारा हुई ।
  5. रामानंदी संप्रदाय : इस संप्रदाय के संस्थापक रामानंद हैं । इन्होंने विशिष्टाद्वैतवाद को मान्यता दी ।
  6. वल्लभ संप्रदाय : इसके प्रवर्तक वल्भाचार्य हैं । इन्होंने शुद्ध अद्वैतवाद को मान्यता दी । इन्होंने श्रीमद्भागवत की तत्त्वबोधिनी टीका लिखी । वल्लभ संप्रदाय में कृष्ण के बाल रूप की उपासना मिलती है ।
  7. चैतन्य संप्रदाय : इसके प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु हैं । इसे गौड़ीया संप्रदाय भी कहा जाता है । द्वैताद्वैतवाद में आस्था । इसमें ब्रह्म की शक्ति राधा की उपासना का विधान है और ब्रह्म के रूप में कृष्ण की शक्ति का विधान है ।
  8. राधा-वल्लभी संप्रदाय : इसके प्रवर्तक हितहरिवंश हैं । इनके ग्रंथ हैं : राधासुधानिधि, हितचौरासी पद ।इस संप्रदाय में राधा ही प्रमुख है ।
  9. हरिदासी या सखी संप्रदाय : इसके प्रवर्तक तानसेन के गुरु हरिदास हैं । इनके ग्रंथ हैं : ललित प्रकाश, केलिमाल, सिद्धांत के पद । इसमें निकुंज बिहारी कृष्ण सर्वोपरि हैं । सहज शृंगार रस में लीन होकर निकुंज लीला परायण कृष्ण की उपासना और नित्य बिहार दर्शन ही सखी का काम्य है ।
इस प्रकार हिंदी कृष्ण काव्य ने धार्मिक क्षेत्र में सुदृढ़, आकर्षक और व्यापक धार्मिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि प्रस्तुत की है ।

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