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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

रीतिकाल : सामान्य परिचय

हिंदी साहित्य में सम्वत् 1700 से 1900 (वर्ष 1643ई. से 1843 ई. तक) का समय रीतिकाल के नाम से जाना जाता है । भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का पूर्व मध्यकाल और रीतिकाल को उत्तर-मध्य काल भी कहा जाता है । भक्ति काल और रीति काल दोनों के काल को हिंदी साहित्य का मध्यकाल कहा जा सकता है ।

रीति का अर्थ है : पद्धति । रस, अलंकार, गुण, ध्वनि और नायिका भेद आदि काव्यांगों के विवेचन करते हुए, इनके लक्षण बताते हुए रचे गए काव्य की प्रधानता के कारण इस काल को रीतिकाल कहा गया । रीतिग्रंथों, रीतिकाव्यों तथा अन्य प्रवृत्तियों के कवियों की रचनाओं में भी श्रृंगार रस की प्रधानता के कारण इस काल को श्रृंगारकाल भी कहा जाता है । इसके अतिरिक्त इस काल को अलंकार काल और कला काल की संज्ञाएँ भी दी गई, लेकिन रीतिकाल नाम ही सर्वाधिक सार्थक और प्रचलित नाम है ।

रीतिकाल के प्रवर्त्तक कवियों में केशवदास और चिंतामणि का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है । लेकिन सर्वामान्य रूप से केशवदास को ही रीतिकाल का प्रवर्त्तक कवि माना गया है ।

रीतिकाल के कवियों को मुख्यत: तीन वर्गों में रखा गया है :-
1. रीतिग्रंथकार कवि या लक्षण बद्ध कवि या रीतिबद्ध कवि
2. रीतिसिद्ध कवि
3. रीतिमुक्त कवि

रीतिकाल में उक्त काव्य धाराओं के समानांतर निम्न काव्य धाराएँ भी विकसित होती रही  :-
1. नीतिकाव्य
2. भक्ति काव्य
3. वीर काव्य

4 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय मनोज भारती जी
    नमस्कार !

    बहुत विशद् विराट विषय है , आपने संक्षेप में समेटने का श्रेष्ठ प्रयास किया है , बधाई !

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. आपका प्रयास सराहनीय है. आपकी मेहनत की दाद देनी होगी.

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